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  • दिलीप कुमार को पाकिस्तान खदेड़ना चाहते थे बाल ठाकरे! कारगिल युद्ध के बीच एक्टर ने की थी नवाज शरीफ से बात

    दिलीप कुमार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे महान कलाकालों में से एक थे और आज भी, फिल्मों में सफलता पाने की चाह रखने वाली युवा पीढ़ी उनके काम की तारीफ करती है। पाकिस्तान में जन्म होने के कारण, उन्हें वहां भी बहुत सम्मान मिलता था, इसलिए जब 1999 में कारगिल में भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ा, तो


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    By Azad Hind Desk जनवरी 17, 2026
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    दिलीप कुमार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे महान कलाकालों में से एक थे और आज भी, फिल्मों में सफलता पाने की चाह रखने वाली युवा पीढ़ी उनके काम की तारीफ करती है। पाकिस्तान में जन्म होने के कारण, उन्हें वहां भी बहुत सम्मान मिलता था, इसलिए जब 1999 में कारगिल में भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ा, तो दिलीप कुमार ने शांति बहाल करने के लिए हर संभव कोशिश का। दरअसल, एक बार उन्होंने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से भी बात की थी और कारगिल की घटनाओं पर निराशा जताई थी।

    यह घटना तब सामने आई जब पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी ने 2015 में भारत का दौरा किया और बताया कि तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कारगिल की स्थिति पर चर्चा करने के लिए नवाज शरीफ को फोन किया था। उन्होंने दिलीप कुमार को भी फोन पर बुलाया, जिन्होंने मई 1999 में शरीफ से बात की थी।

    नवाज शरीफ और दिलीप कुमार की बातचीत

    फोन पर बातचीत के दौरान वाजपेयी ने कहा कि पाकिस्तान दौरे के बाद उन्होंने हालात और बिगाड़ दिए और कारगिल पर कब्जा करने की कोशिश की, जिससे उन्हें बहुत निराशा हुई। शरीफ ने दावा किया कि उन्हें कारगिल की स्थिति की कोई जानकारी नहीं थी। फोन रखने से पहले वाजपेयी ने शरीफ से कहा कि वे अपने बगल में बैठे किसी व्यक्ति से बात करें, और दिलीप कुमार ने इस मौके का फायदा उठाते हुए बातचीत में हिस्सा लिया। बताया जाता है कि दिलीप कुमार ने कहा, ‘मियां साहब, हमें आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी क्योंकि आप हमेशा पाकिस्तान और भारत के बीच शांति के समर्थक होने का दावा करते रहे हैं।’

    कारगिर युद्ध के दौरान दिलीप कुमार ने की बात

    उन्होंने आगे कहा, ‘मैं एक भारतीय मुसलमान के तौर पर आपको बताना चाहता हूं कि पाकिस्तान और भारत के बीच तनाव की स्थिति में भारतीय मुसलमान बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं और उनके लिए अपने घरों से बाहर निकलना भी मुश्किल हो जाता है। कृपया इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कुछ करें।’ कहा जाता है कि इस फोन कॉल के बाद कुछ दिनों के लिए स्थिति स्थिर हुई, लेकिन फिर बिगड़ गई और अगले तीन महीनों तक युद्ध चलता रहा।

    दिलीप कुमार ने पाकिस्तान से लिया पुरस्कार

    दिलीप कुमार ने 1998 में एक बार फिर पाकिस्तान का दौरा किया, जब पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, निशान-ए-इम्तियाज से सम्मानित करने की घोषणा की। लेकिन इस घोषणा ने भारत में कई सवाल खड़े किए, और इसका विरोध करने वालों में शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे भी थे। उस दौर में जब भारत अपने पड़ोसियों के साथ शांति बनाने की लगातार कोशिश कर रहा था, बालासाहेब पाकिस्तानियों के विरोधी थे और दिलीप कुमार के साथ उनके संबंध खराब हो गए।

    दिलीप कुमार बोले- मुझे वफादारी साबित करनी होगी!

    वैभव पुरंधारे ने अपनी किताब ‘बाल ठाकरे और शिवसेना का उदय’ में ठाकरे के हवाले से कहा है, ‘अभी चना भी है, बीयर भी है, लेकिन दिलीप कुमार के रास्ते बदल गए।’ दिलीप कुमार ठाकरे की के इस कमेंट से काफी आहत हुए और इंडिया टुडे से बातचीत में उन्होंने कहा, ’65 साल यहां रहने के बाद मुझे ठाकरे के प्रति अपनी वफादारी साबित करनी होगी।’ बालासाहेब ने यह भी कहा कि दिलीप कुमार को भारत छोड़कर पाकिस्तान में रहना चाहिए। इसके जवाब में दिलीप कुमार ने एनडीटीवी को बताया, ‘शिवसेना और उनके नेता ने कहा कि मुझे पुरस्कार लौटा देना चाहिए और अगर मैं पुरस्कार नहीं लौटाता तो मुझे यह देश छोड़कर पाकिस्तान वापस जाकर वहीं रहना चाहिए। मुझे लगता है कि एक जिम्मेदार व्यक्ति का घिनौना बयान है। यह आहत करने वाला है। यह आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है। इससे अन्याय का एहसास होता है और गुस्सा आता है।’

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