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  • देश की कंपनियों का फोकस अब मिडिल क्लास परिवारों पर, सैलरीड टैक्सपेयर्स की संख्या में 600% इजाफा

    लेखक: अनिल पद्मनाभनभारत की अर्थव्यवस्था की कहानी अक्सर दो चरम बिंदुओं को दिखाती है। एक तरफ है गरीबी की चुनौती और असमानता, जबकि दूसरे छोर पर अमीरों की बढ़ती संख्या और उपभोग में उछाल। इनके बीच पिछले एक दशक में सबसे बड़ा बदलाव आया है मध्यम वर्ग में। बढ़ता दायरा: आयकर विभाग के आंकड़े बताते


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    By Azad Hind Desk जनवरी 30, 2026
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    लेखक: अनिल पद्मनाभन
    भारत की अर्थव्यवस्था की कहानी अक्सर दो चरम बिंदुओं को दिखाती है। एक तरफ है गरीबी की चुनौती और असमानता, जबकि दूसरे छोर पर अमीरों की बढ़ती संख्या और उपभोग में उछाल। इनके बीच पिछले एक दशक में सबसे बड़ा बदलाव आया है मध्यम वर्ग में।

    बढ़ता दायरा: आयकर विभाग के आंकड़े बताते हैं कि सैलरी वर्ग में बड़ा परिवर्तन आ रहा है। वित्तीय वर्ष 2023-24 के डेटा के मुताबिक, इससे पहले के 9 बरसों में 10 से 15 लाख और 15 से 20 लाख इनकम स्लैब में आने वाले सैलरीड टैक्सपेयर्स की संख्या लगभग 600% बढ़ी थी। 2014 में अपर-मिडल क्लास एक छोटा-सा वर्ग माना जाता था, पर आज वह बहुत बड़ा है।

    आय में उछाल: यह कहानी सिर्फ ज्यादा तनख्वाह मिलने की नहीं है। यह उस उभरते मध्यम वर्ग की कहानी है, जो देश के कंजम्पशन पैटर्न, बचत, निवेश और राजनीति पर भी असर डालेगा। हाल के बरसों में मध्यम वर्ग से इनकम टैक्स भरने वालों की संख्या बढ़ी है। यह लोगों की आय बढ़ने का संकेत है। टैक्स फाइलिंग से पता चलता है कि 5 से 50 लाख के बीच, हर आय वर्ग में उछाल आया है, पर मध्यम श्रेणी में यह सबसे तेज है।

    ज्यादा टैक्स रिटर्न: 10-15 लाख रुपये की कैटिगरी को देखें, तो इसमें टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या 8.3 लाख से बढ़कर 50 लाख को पार कर चुकी है, यानी 6 गुना से भी ज्यादा बढ़ोत्तरी। यहां खास बात यह है कि इतनी तेजी के बावजूद इन श्रेणियों में औसत सैलरी स्थिर रही है या कुछ केस में थोड़ी घटी ही है। मसलन-10-15 लाख रुपये वाली श्रेणी में औसत सैलरी 12.11 लाख से थोड़ा कम होकर 12.05 लाख रुपये हो गई है। इससे जाहिर होता है कि नए लोग इन कैटिगरी के निचले हिस्से यानी जहां से शुरुआत हो रही है, वहां जुड़ रहे हैं। इससे तादाद बढ़ रही है, पर औसत गिरा है।

    बाजार के चहेते: इस बदलाव का आर्थिक असर बहुत गहरा है। परिवारों की आय बढ़ने के साथ उनका खर्च भी बढ़ता है। स्मार्टफोन से लेकर रिटेल तक-उपभोक्ता वस्तुओं में प्रीमियम प्रॉडक्ट्स की मांग बढ़ने लगती है। अब भारत के बाजार सिर्फ अमीर लोगों की वजह से नहीं चल रहे, साथ में मिडल क्लास भी है। इस वर्ग के पास पैसा है और इच्छा भी। यही कारण है कि कंपनियां इन आम, लेकिन खास ग्राहकों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।

    बचत पर असर: पहले भारत में लोग ज्यादातर गोल्ड और रियल एस्टेट में पैसा लगाते थे। दूसरे पारंपरिक तरीके थे इंश्योरेंस और फिक्स्ड डिपॉजिट। शेयर बाजार से बहुत कम लोग जुड़े थे। अब जैसे-जैसे सैलरी पाने वाले वर्ग की आय बढ़ी है, उसने म्यूचुअल फंड्स, शेयर और पेंशन से जुड़े निवेश विकल्प अपनाना शुरू कर दिया है। पिछले 6 बरसों में डीमैट अकाउंट्स की संख्या पांच गुना से ज्यादा बढ़ गई है।

    जोखिम की क्षमता: यह मध्यम वर्ग पहले से अलग है, क्योंकि यह पूरी तरह औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। नौकरीपेशा लोग औपचारिक जरियों से कर्ज लेते हैं, EMI चुकाते हैं और सुरक्षित निवेश करते हैं। इन लोगों की रुचि उन आर्थिक सुधारों में है, जिनसे चीजें आसान होती हैं – जैसे बिजनेस में आसानी, स्पष्ट टैक्स नियम, इंफ्रा डिवेलपमेंट और महंगाई पर नियंत्रण। यह वर्ग जोखिम ले सकता है, इस कारण इससे नए उद्यमी निकल रहे हैं।

    राजनीतिक प्रभाव: दायरा बढ़ने के साथ मध्यम वर्ग का राजनीतिक असर भी बढ़ेगा, खासकर शहरी क्षेत्र में। परिसीमन में शहरी और कस्बाई इलाकों में सीटें बढ़ेंगी। इससे भी मध्यम वर्ग की राजनीतिक आवाज मजबूत होगी। यह वर्ग आर्थिक स्थिरता, रोजगार, महंगाई पर नियंत्रण और भरोसेमंद सरकारी सेवाओं को प्राथमिकता देता है। इन्हें अस्थिर नीतियां पसंद नहीं। आने वाले एक दशक में नीतियों पर इनका असर पड़ेगा।

    सियासी चेतावनी: पुराने तरीकों से काम करने वाले राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी है कि मतदाता उनकी सोच से भी ज्यादा तेजी से बदल रहे हैं। पिछले दो दशकों में भारत का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक बदलाव खामोशी से, लेकिन निर्णायक रूप से हुआ है – मध्यम वर्ग का विस्तार। भविष्य में वित्त मंत्रियों के लिए इस वर्ग को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।

    तेजी और स्थिरता: यह वर्ग देश की अर्थव्यवस्था में अभी जितना पहले कभी शामिल नहीं रहा, इसलिए लोकप्रिय आर्थिक नीतियों का बोझ आसानी से नहीं सहन कर सकता। इसकी मांग है कि काम तेजी से हो, स्थिरता आए और मौके बनें। पीएम नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अगले सुधारों को इसी वर्ग के पैमाने पर आंका जाएगा। खासकर देखा जाएगा कि ये सुधार उनके जीवन को आसान बनाने में कितने मददगार हैं।
    (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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