भारत में समय की पाबंदी लोगों की सहूलियत के हिसाब से चलती है। ऐसे में हैरानी की बात है कि पूरा देश इस समय 10 मिनट में ग्रोसरी डिलिवरी की बहस में उलझा हुआ है। सरकार ने क्विक कॉमर्स कंपनियों से कहा है कि वे अपने विज्ञापनों में ’10 मिनट डिलिवरी’ की टैगलाइन इस्तेमाल न करें। यह जानकर अच्छा लगा कि देश अचानक से सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूक हो गया है, वरना आमतौर पर यह कोई मुद्दा ही नहीं है। लेकिन, हकीकत यह है कि मार्केटिंग में बदलाव करने से जमीनी स्तर पर बदलाव नहीं आने वाला।
जवाबदेही की कमी
10 मिनट में डिलिवरी का वादा केवल मार्केटिंग का तरीका है। इसमें कोई कानूनी प्रतिबद्धता नहीं है और न ही ग्राहकों के प्रति जवाबदेही। डोमिनो ने 30 मिनट में डिलिवरी या फ्री का वादा किया था। वहां पता था कि समय पर सामान नहीं मिलने पर क्या होगा, लेकिन 10 मिनट वाले केस में ऐसा कुछ नहीं है।
मार्केटिंग का खेल
हां, ऐसी टैगलाइन कंपनियों पर दबाव जरूर बनाती हैं, क्योंकि ग्राहक एक तय समय-सीमा में डिलिवरी की उम्मीद करने लगते हैं। लेकिन, एक बार जब ग्राहकों की उम्मीदें एक खास टाइम लिमिट से जुड़ चुकी हैं, तब टैगलाइन बदलने से ज्यादा असर नहीं पड़ना चाहिए। मार्केटिंग डिपार्टमेंट इसी तरह की दूसरी लाइन दे सकते हैं, जैसे – ‘आपकी चाय ठंडी होने के पहले डिलिवरी’ या फिर ‘एड ब्रेक खत्म होने के पहले आपके दरवाजे पर’।
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डेटा का उपयोग
अल्ट्रा-फास्ट डिलिवरी का वादा इस तरह पूरा नहीं किया जाता कि एजेंट पूरे शहर में तेज रफ्तार से दौड़ते रहें या लंबी दूरी तय करें। इसके पीछे है डेटा का समझदारी से इस्तेमाल, कम लागत वाला श्रम और घनी आबादी वाले इलाकों में छोटे गोदाम। क्विक कॉमर्स कंपनियां ग्राहकों की मांग को देखकर उन्हीं इलाकों में डार्क स्टोर खोलती हैं, जहां से डिलिवरी आसान हो।
समय का दबाव
एल्गोरिदम के स्तर पर देखा जाए, तो ग्राहकों को कभी 10 मिनट का तय समय नहीं दिखाया जाता। डार्क स्टोर की दूरी, ट्रैफिक, दिन का समय, मौसम और राइडर की उपलब्धता के हिसाब से यह बदलता रहता है। सबसे अहम बात यह है कि राइडर्स को वह समय नहीं दिखता, जिसका वादा ग्राहकों से किया गया है यानी उन पर डेडलाइन पूरा करने का दबाव नहीं होता।
काम की प्रकृति
डिलिवरी बॉय अगर जल्दबाजी में दिखते हैं, तो इसकी वजह गिग वर्क की प्रकृति है। इस काम में डिलिवरी के हिसाब से भुगतान मिलता है। जितनी जल्दी एक डिलिवरी पूरी होगी, उतनी ही जल्दी राइडर दूसरी डिलिवरी ले पाएगा। अब वादा चाहे 10 मिनट का हो या आधे घंटे का, जब काम की प्रकृति नहीं बदली तो व्यवहार कैसे बदल जाएगा।
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सेक्टर की जिम्मेदारी
दूसरे देशों के मुकाबले भारत में गिग वर्कर्स की स्थिति काफी अलग है। यहां इस काम को फ्रीलांस नहीं, बल्कि कमाई का मुख्य जरिया माना जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था रोजगार के पर्याप्त मौके नहीं पैदा कर पाई, लेकिन इसकी पूरी जिम्मेदारी एक सेक्टर पर डालना ठीक नहीं। यह बात सही है कि देश के युवा बड़ी संख्या में ऐसे काम कर रहे हैं, जिसमें आगे बढ़ने का रास्ता नहीं है। इसे आदर्श स्थिति नहीं मान सकते, लेकिन विकसित देशों की तरह श्रम मानक लागू करने की मांग भी सही नहीं है।
बदहाल ट्रैफिक
भारत में ट्रैफिक नियम तोड़ना आम समस्या है। पुलिसवाले तक रॉन्ग साइड गाड़ी चलाते दिख जाते हैं। नियमों का पालन कराने की व्यवस्था कमजोर है। अब राइडर्स चूंकि खास ड्रेस पहनते हैं, तो वह पहचान में आ जाते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि केवल वही नियम तोड़ रहे हैं। और यह मान लेना भी गलत होगा कि ’10 मिनट’ न कहने से अब वे ट्रैफिक नियमों का पालन करने लगेंगे।
कंपनियों से मांग
हमारी मांग यह होनी चाहिए कि देरी से डिलिवरी पर क्या पेनाल्टी होगी, कंपनियां बताएं। वे अपने राइडर्स को ट्रैक करती हैं, तो उनको ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूक करें। कंपनियों को बताना चाहिए कि कितने डिलिवरी एजेंट सड़क हादसों का शिकार होते हैं। इससे पता चलेगा कि क्या उनमें हादसों की दर ज्यादा है।
सरकार को छूट
कंपनियों से टैगलाइन हटाने को कहना आसान सरकारी कदम है। इससे सरकार को ज्यादा मुश्किल काम से छूट मिल जाती है, मसलन – नियमों को सख्ती से लागू करना, इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार या पुलिस की जवाबदेही तय करना। इससे एक खतरा भी है – कहीं स्लोगन हटाकर यह न मान लिया जाए कि समस्या खत्म हो गई।
(लेखक बेंगलुरु के तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में अर्थशास्त्र के प्रफेसर हैं)











