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  • पद्म श्री पाने वालों में ऐसा पूर्व अफसर, जिसने इशरत एनकाउंटर केस में यूपीए को ‘बेनकाब’ किया, जानें प्रोफाइल

    नई दिल्ली: गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकारी आरवीएस मणि को सिविल सेवा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह वहीं अधिकारी हैं, जिन्होंने 2009 में इशरत जहां केस में यूपीए सरकार द्वारा दायर दो विरोधाभासी हलफनामों का खुलासा करने में अहम भूमिका निभाई थी। ये दोनों हलफनामें


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    By Azad Hind Desk जनवरी 27, 2026
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    नई दिल्ली: गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकारी आरवीएस मणि को सिविल सेवा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह वहीं अधिकारी हैं, जिन्होंने 2009 में इशरत जहां केस में यूपीए सरकार द्वारा दायर दो विरोधाभासी हलफनामों का खुलासा करने में अहम भूमिका निभाई थी। ये दोनों हलफनामें इशरत जहां एनकाउंटर केस से जुड़े थे और दोनों पर उनके ही हस्ताक्षर थे।

    सरकार द्वारा 6 अगस्त 2009 को दायर पहला हलफनामा, केंद्रीय खुफिया एजेंसियों से मिले सटीक इनपुट पर आधारित थी। इन इनपुट के अनुसार, इशरत जहां भारत में कई सीनियर लेवल के राजनेताओं की हत्या के लिए गठित लश्कर-ए-तैयबा मॉड्यूल का हिस्सा थी। 29 सितंबर 2009 को दायर दूसरे हलफनामे में इन खुफिया इनपुट के साक्ष्य को खारिज कर दिया गया था, साथ ही केंद्र सरकार ने गुजरात सरकार की कार्रवाई से खुद को अलग कर लिया था।

    राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण हलफनामे में हुआ था संशोधन

    कुछ सालों बाद आरवीएस मणि सार्वजनिक रूप से दावा किया कि हलफनामे को संशोधित करने के पीछे राजनीतिक हस्तक्षेप था। उन्होंने स्वीकार किया कि पहला हलफनामा खुफिया रिपोर्टों पर आधारित था। उन्होंने बताया कि रिपोर्टों में इशरत जहां, जावेद शेख उर्फ प्रनेश पिल्लई, जिशन जोहर और अमजद अली नाम के चार सदस्यों वाले मॉड्यूल के आतंकी पृष्ठभूमि का स्पष्ट विवरण था।

    उन्होंने 15 जून 2004 को अहमदाबाद में हुए एनकाउंटर की घटनाओं का क्रम भी बताया था, जिसमें ये चारों लोग मारे गए थे। पहले हलफनामें लश्कर-ए-तैएबा के मुखपत्र ‘गजवा टाइम्स’ में छपी भारतीय अखबारों की रिपोर्टों का हवाला दिया गया था, जिसमें दावा किया गया था कि ‘इशरत जहां, जो कि LeT की एक महिला कार्यकर्ता थी उसका बुर्का भारतीय पुलिस ने हटा दिया और उसके शव को अन्य ‘मुजाहिदीन (आतंकवादियों)’ के साथ रखा गया था।” इसे उसकी आतंकी संबंधों की पुष्टि के तौर पर पेश किया गया था।

    दूसरे हलफनामे में गृहमंत्रालय ने क्या कहा?

    वहीं दूसरे हलफनामे में गृह मंत्रालय ने कहा कि सभी खुफिया इनपुट निर्णायक सबूत साबित नहीं होते हैं और ऐसे इनपुट पर कार्रवाई करना राज्य सरकार और राज्य पुलिस का काम है। इसमें यह भी कहा गया था कि केंद्र सरकार ऐसी किसी भी कार्रवाई से संबंधित नहीं है और किसी भी अनुचित या अत्यधिक कार्रवाई का समर्थन नहीं करती है। जहां पहले हलफनामे में कहा गया था कि यह मामला सीबीआई जांच के लिए उपयुक्त नहीं है, वहीं दूसरे हलफनामे में केंद्र ने स्वतंत्र जांच या सीबीआई जांच पर कोई आपत्ति न होने की बात कही थी।

    आरवीएस मणि ने बाद में बड़ा बयान देते हुए कहा था कि दूसरा हलफनामा उन्होंने नहीं लिखा था, केवल आदेश के तहत उस पर उन्होंने उस पर हस्ताक्षर करके उसे दायर किया था। 2016 में तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बयान दिया था कि दूसरे हलफनामे को तत्कालीन अटॉर्नी जनरल ने जांचा था और तत्कालीन गृह मंत्री (पी. चिदंबरम) ने मंजूरी दी थी। फाइल पर की गई टिप्पणियों में हलफनामा संशोधित करने का कोई कारण नहीं बताया गया था।

    राजनाथ ने संसद में किया था जिक्र

    राजनाथ के बयान में 26/11 के आरोपी और अमेरिकी LeT ऑपरेटिव डेविड कोलमैन हेडली की गवाही का भी जिक्र था, जिसने इशरत जहां को एक महिला आतंकवादी के रूप में पुष्टि की थी। जिसे भारतीय पुलिस ने एक LeT के एक असफल ऑपरेशन में मार गिराया था।

    आरवीएस मणि ने यह भी कहा था कि 2013 में जब उन्हें SIT के प्रमुख के सामने बुलाया गया था तो उन्हें प्रताड़ित किया गया था। मणि ने आतंकी जांच में राजनीतिक हस्तक्षेप के केंद्रीय विषय पर कई किताबें लिखी हैं, जिनमें ‘द मिथ ऑफ हिंदू टेरर: इनसाइडर अकाउंट ऑफ मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स’ और ‘डिसेप्शन: ए फैमिली दैट डिसीव्ड द होल नेशन’ शामिल हैं।

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