यह फैसला पुणे की दो रियल एस्टेट कंपनियों, ‘रिदम कंट्री’ और ‘की स्टोन प्रॉपर्टीज’ के खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा लगाए गए जुर्माने को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए आया है। NGT ने इन कंपनियों पर आवासीय और व्यावसायिक प्रोजेक्ट बनाने के लिए पर्यावरण मंजूरी न लेने पर क्रमशः 5 करोड़ रुपये और 4.47 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। जस्टिस दत्ता ने दोनों रियलटर्स की इस दलील को खारिज कर दिया कि लगाया गया जुर्माना बहुत ज्यादा है।
कोर्ट ने इस तर्क को भी ठुकरा दिया कि NGT के पास इतने बड़े पर्यावरण क्षति मुआवजे का आरोप लगाने का अधिकार या शक्ति नहीं है। जस्टिस दत्ता ने समझाया कि NGT एक्ट के जरिए संसद ने ट्रिब्यूनल को पर्यावरण को हुए नुकसान की गंभीरता के आधार पर राहत देने का अधिकार दिया है।
- रियल एस्टेट कंपनियों की मुख्य दलील यह थी कि कंपनी का टर्नओवर (जितना पैसा कमाया) या प्रोजेक्ट की लागत पर्यावरण मुआवजे की गणना के लिए पैमाना नहीं हो सकती। लेकिन कोर्ट ने कहा, ‘हम इस दलील से सहमत नहीं हैं। न तो NGT एक्ट और न ही इस अदालत के पिछले फैसले पर्यावरण मुआवजे की गणना के लिए एक समान फॉर्मूले की मांग करते हैं।’
- सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में, कंपनी के काम के पैमाने को पर्यावरण को हुए नुकसान से जोड़ना मुआवजे की राशि तय करने का एक मजबूत तरीका हो सकता है। कंपनी के काम का पैमाना जैसे कि उसका टर्नओवर, उत्पादन की मात्रा, या कमाई।
- कोर्ट ने आगे कहा, ‘बड़े पैमाने पर काम करने का मतलब है बड़ा फुटप्रिंट। बड़े पैमाने का मतलब है ज्यादा संसाधनों का इस्तेमाल, ज्यादा प्रदूषण, ज्यादा कचरा, जिससे पर्यावरण पर ज्यादा दबाव पड़ता है। अगर कोई कंपनी अपने बड़े पैमाने से ज्यादा मुनाफा कमाती है, तो यह स्वाभाविक है कि पर्यावरण की लागत के लिए उसकी जिम्मेदारी भी ज्यादा हो।’
पर्यावरण सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बड़े खिलाड़ियों को पर्यावरण के नियमों का पालन करना होगा। ‘अगर किसी कंपनी का टर्नओवर बहुत ज्यादा है, तो यह उसके काम के बड़े पैमाने को दर्शाता है। ऐसी कंपनी, अगर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में ज्यादा योगदान देती है, तो उसके टर्नओवर का सीधा संबंध उस नुकसान की सीमा से हो सकता है जो उसने किया है। यह फैसला इस बात पर जोर देता है कि पर्यावरण की रक्षा में बड़ी कंपनियों की भूमिका बहुत अहम है और उन्हें अपने काम के पैमाने के हिसाब से ज्यादा जिम्मेदारी लेनी होगी। यह फैसला पर्यावरण के प्रति कंपनियों की जवाबदेही को मजबूत करता है।













