FIR और NCR में है काफी फर्क
देखा जाए तो अपराध को भी दो कैटिगरी में रखा गया है। गंभीर किस्म का अपराध जो कॉग्निजिबल ऑफेंस है और कम गंभीर यानी मामूली अपराध जिसे नॉन कॉग्निजिबल ऑफेंस कहा जाता है। दरअसल, नॉन कॉग्निजिबल ऑफेंस मामूली किस्म का अपराध है जिसमें पुलिस FIR दर्ज नही करती और न ही FIR करने के लिए उसकी कोई बाध्यता है।
दिल्ली पुलिस दर्ज करती है NCR
पुलिस ऐसे अपराध के मामले में थाने की डायरी में एंट्री करती है और उस आधार पर NCR दर्ज करती है। अगर किसी का कोई सर्टिफिकेट खो जाए, अगर कही मोबाइल गुम हो जाए या फिर लैपटॉप या टैब गुम हो जाए, किसी का पर्स गायब या गुम हो जाए और उसमें कुछ ऐसे दस्तावेज मसलन ड्राइविंग लाइसेंस, गाड़ी के पेपर्स आदि हो तो पुलिस को इत्तला करना जरूरी है। ऐसे मामले में पुलिस NCR दर्ज करती है। NCR दर्ज होने के बाद दोबारा ऐसे डॉक्युमेंट्स बनवाने में मदद मिलती है।
डॉक्युमेंट्स फिर बनवाने और क्लेम में मदद
दरअसल, ऐसा दस्तावेज जो गुम हो गया हो और कोई उसका गलत इस्तेमाल कर सकता हो तो NCR कराने पर बचाव हो सकता है। मान लें, कोई गुम हुए मोबाइल का गलत इस्तेमाल कर ले तो भी NCR होने से प्रोटेक्शन मिल जाता है। इसी तरह लैपटॉप या टैब आदि गुम होने की स्थिति में NCR से बचाव होता है। अगर ड्राइविंग लाइसेंस जैसा कोई डॉक्युमेंट खो गया है तो NCR दर्ज होने के आधार पर डुप्लिकेट डॉक्युमेंट जारी कराने में मदद मिलती है। साथ ही किसी कीमती सामान का इंश्योरेंस ले रखा है तो भी NCR के सहारे इंश्योरेंस क्लेम में मदद मिलती है।
ऑनलाइन भी दर्ज करा सकते हैं NCR
नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा-174 (पहले CRPC की धारा-155) के तहत ही नॉन कॉग्निजिबल रिपोर्ट यानी NCR दर्ज होती है। NCR दर्ज करने के बाद पुलिस उसकी कॉपी कोर्ट को भेजती है और सामान की रिकवरी होने पर शिकायती के सुपुर्द कर देती है। बिना मैजिस्ट्रेट के आदेश के पुलिस छानबीन नहीं करती है। कोई सामान गुम होने की स्थिति में पुलिस डिपार्टमेंट की संबंधित साइट पर जाकर NCR ऑनलाइन दर्ज करने का भी ऑप्शन मिलता है। उसमें गुम हुए सामान की डिटेल्स, टाइम और जगह आदि भरने के बाद ऑनलाइन NCR दर्ज हो जाती है। उसकी कॉपी प्रिंट की जा सकती है।














