बढ़ रहे खतरनाक दिन। सर्दियों में ‘बहुत खतरनाक’ दिनों की संख्या बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में स्कूल-दफ्तर बंद कर दिए जाते हैं। निर्माण कार्य रोक दिए जाते हैं। देश के अन्य शहरों की हालत भी यही है। अनुमान है कि प्रदूषण से भारत की अर्थव्यवस्था को सालाना करीब 100 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। प्रदूषण से होने वाली बीमारियों और इससे श्रमबल पर पड़ने वाले असर
से आंकड़ा और बढ़ सकता है।
कारण जानना जरूरी। सवाल उठता है कि क्या प्रदूषण का कोई समाधान नहीं या सरकार के प्रयासों में कमी है? हमें पहले सही कारण तलाशने होंगे। भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या, पराली जलाने, शहरीकरण और वाहनों-कारखानों से निकलने वाले धुएं को मुख्य कारण माना जाता है। दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों को विकास की प्रक्रिया के दौरान इन चुनौतियों से गुजरना पड़ा। आज अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन को विश्व का सबसे स्वच्छ देश कहा जाता है। 1980 के दशक में अमेरिका और कनाडा में तेजाब की बारिश होने लगी थी। पेड़-पौधों, वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के विलुप्त होने का खतरा मंडराने लगा। लंदन की टेम्स नदी मृत घोषित कर दी गई।
दुनिया में बने नजीर । अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन ने न सिर्फ आर्थिक और विकास गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए, बल्कि संरक्षण के काम में लगे लोगों को प्रोत्साहित भी किया। ट्रेडेबल कार्बन क्रेडिट की व्यवस्था की। तय किया कि प्रदूषक गैसों का उत्सर्जन हर साल एक लाख टन से अधिक नहीं होना चाहिए। अगर देश में एक हजार फैक्ट्रियां हैं तो फैक्ट्रियों को उनके आकार (छोटे, मझोले और बड़े) के आधार पर 10 से 100 टन कार्बन उत्सर्जन की छूट दे दी जाती है। सीमा से अधिक उत्सर्जन पर भारी कीमत वसूली जाने लगी। फैक्ट्रियों को अपने उत्सर्जन कोटे को बचाने और दूसरों को हस्तांतरित करने की आजादी दी गई। आम लोगों को पेड़ लगाकर उत्सर्जन क्रेडिट बेचने का मौका दिया गया।
भावना पर चोट । दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए तंदूर, कोयले वाले प्रेस आदि पर प्रतिबंध से गरीबों की भावना आहत होती है। उन्हें लगता है कि प्रदूषण का मुख्य कारण निर्माणाधीन इमारतें हैं दिन-रात चलने वाली फैक्ट्रियां और गाड़ियां है। लेकिन, कार्रवाई हमारी कमाई पर की जाती है। कार्बन क्रेडिट जैसी व्यवस्था अगर यहां शुरू की जाए, तो बगैर शोर के समस्या सुलझाई जा सकती है।
(लेखक पब्लिक पॉलिसी मामलों के जानकार हैं)














