वही मंजूर फिर आया सामने
भू-रणनीतिकार ब्रह्म चेलानी ने 2019 के ईरानी तेल प्रतिबंधों और चाबहार पोर्ट पर मिली छूट-जो अप्रैल में खत्म होने वाली है-के बीच समानताएं बताई हैं। भारत, जिसने इस पोर्ट में निवेश किया था, अब वहां से पीछे हट रहा है। यह पोर्ट पाकिस्तान के चीनी-संचालित ग्वादर पोर्ट का एक रणनीतिक जवाब था।
भारत का पीछे हटना हैरान करने वालाः चेलानी
चेलानी ने कहा, ‘यह पीछे हटना और भी हैरान करने वाला है क्योंकि मई 2024 में ही भारत और ईरान ने औपचारिक रूप से 10 साल के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत भारत को चाबहार के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को विकसित करने, सुसज्जित करने और संचालित करने का अधिकार मिला था। ‘इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड’ (IPGL) और ईरान के ‘पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन’ (PMO) के बीच हुआ यह अनुबंध पुरानी अल्पकालिक व्यवस्थाओं की जगह लाया गया था और ऐसा लग रहा था कि इससे पोर्ट में भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक और व्यावसायिक हिस्सेदारी पक्की हो गई है। इसने भारत को एक दशक के लिए सामान्य कार्गो और कंटेनर टर्मिनल पर परिचालन नियंत्रण दिया था, साथ ही इसे रिन्यू करने का विकल्प भी था।’
भारत पर अमेरिका बना रहे दबाव
अमेरिका ने पिछले साल चाबहार-विशिष्ट प्रतिबंधों में वह छूट वापस ले ली जो उसने 2018 में भारत को दी थी। चेलानी ने कहा, ‘अगले ही महीने, वाशिंगटन ने छह महीने की अस्थायी छूट जारी की-भारत के निवेश को बचाने के लिए नहीं, बल्कि केवल इसलिए ताकि नई दिल्ली अप्रैल 2026 तक अपना काम-काज समेट सके।’ चेलानी ने कहा, ‘इस तरह अमेरिका भारत पर अपना दबाव बनाने और उसका इस्तेमाल करने का विकल्प चुनता है।’
चाबहार से कदम पीछे खींच रहा भारत
रिपोर्ट्स में कहा गया है कि भारत ने चाबहार पोर्ट के विकास के लिए ईरान को दी गई 120 मिलियन डॉलर की प्रतिबद्धता राशि ट्रांसफर कर दी है। यह किसी से छिपा नहीं था कि अमेरिका पोर्ट पर अपने प्रतिबंध फिर से लगा देगा। एक सरकारी सूत्र ने ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ को बताया कि अगर प्रतिबंध दोबारा लगते तो फंड ट्रांसफर करना मुश्किल हो जाता, इसीलिए भारत ने प्रतिबंध लगने से पहले ही सारा फंड ट्रांसफर कर दिया। अब भारत पर कोई देनदारी नहीं है और ईरानी सरकार ट्रांसफर किए गए पैसे का जैसे चाहे इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र है।












