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  • ‘बच्ची नाबालिग, इसलिए प्रेग्नेंसी अवैध, मां बनने को कैसे कहें’; सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

    नई दिल्ली: ‘कोई भी अदालत किसी महिला खासकर नाबालिग को बिना उसकी मर्जी के मां बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है।’ शुक्रवार को यह टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 30 हफ्ते की गर्भवती नाबालिग लड़की के गर्भपात की इजाजत दे दी। जस्टिस बीवी नागरत्ना की अगुवाई वाली बेंच ने इस बात पर


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    By Azad Hind Desk फरवरी 7, 2026
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    नई दिल्ली: ‘कोई भी अदालत किसी महिला खासकर नाबालिग को बिना उसकी मर्जी के मां बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है।’ शुक्रवार को यह टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 30 हफ्ते की गर्भवती नाबालिग लड़की के गर्भपात की इजाजत दे दी। जस्टिस बीवी नागरत्ना की अगुवाई वाली बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि गर्भवती लड़की की प्रजनन स्वायत्तता (रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी) को महत्व दिया जाना चाहिए, खासकर उन परिस्थितियों में जब उसने स्पष्ट रूप से गर्भावस्था जारी न रखने की इच्छा जताई हो।

    अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि नाबालिग बच्ची को गर्भावस्था जारी रखने का अधिकार है। लेकिन इस पहलू पर ध्यान देने की जरूरत है कि इस स्थिति में गर्भावस्था पहली नजर में अवैध (इलिजिटिमेट) है। क्योंकि वह नाबालिग है और एक रिश्ते से उत्पन्न दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति के कारण गर्भावस्था का सामना कर रही है।

    बेंच ने स्पष्ट किया कि मुद्दा यह नहीं है कि वह संबंध सहमति से था या यौन उत्पीड़न का परिणाम है। अंतिम तथ्य यह है कि गर्भवास्था अवैध है, क्योंकि लड़की नाबालिग है। इस तरह जन्म लेने वाला बच्चा वैध नहीं होगा। दूसरा यह कि होने वाली मां उस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती। याचिका स्वीकार करते हुए बेंच ने मुंबई के जे.जे. अस्पताल को निर्देश दिया कि मेडिकल ऐहतियात का पालन करते हुए नाबालिग की गर्भावस्था का मेडिकल टर्मिनेशन करें।

    क्या है मौजूदा कानून, SC के पहले के फैसले?

    केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2021 में प्रेग्नेंसी खत्म करने के लिए कानून में बदलाव करते हुए कुछ शर्तों के साथ मियाद 20 से बढ़ाकर 24 हफ्ते कर दी थी। इसके लिए मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (संशोधन) रूल्स 2021 का नोटिफिकेशन जारी किया था। इसके तहत विशेष कैटिगरी की महिलाओं के लिए प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन की मियाद 24 हफ्ते कर दी गई थी। इसमें रेप विक्टिम से लेकर शादी का स्टेटस बदले जाने की स्थिति में प्रेग्नेंसी खत्म करने की इजाजत दी गई थी।

    क्या है 20 और 24 हफ्ते का फर्क ?

    एक्ट की धारा-3 (2) (ए) कहता है कि अगर 20 हफ्ते तक की प्रेग्नेंसी है तो खत्म किया जा सकता है। धारा 3 (2) (बी) कहता है कि अगर प्रेग्नेंसी 20 हफ्ते से ज्यादा और 24 हफ्ते तक की हो तो भी महिला के जीवन को खतरा होने या गभीर इजरी (मेटल या फिजिकल) के आधार पर प्रेग्नेंसी खत्म किया जा सकता है। बच्चे में विकृति या रिस्क, रेप की शिकार और नाबालिग की प्रेग्नेंसी खत्म की जा सकती है।

    विवाहित-अविवाहित के बारे में क्या कहा था?

    सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की अगुवाई वाली बेंच ने कहा था कि अविवाहित महिला को एमटीपी ऐक्ट और नियमों के दायरे से बाहर रखना गैर संवैधानिक है। ऐसी अविवाहित महिला, जो सहमति से गर्भवती हुई है, उसे गर्भपात के अधिकार से वचित करना गैर संवैधानिक है। एमटीपी ऐक्ट कहीं से भी विवाहित-अविवाहित महिलाओं मे भेदभाव नहीं करता है।

    यह हमारे लिए भी कठिन है, लेकिन क्या किया जाए। क्या हमें उसे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करना चाहिए? क्योंकि जो बच्चा पैदा होगा, वह भी अंततः एक जीवन होगा। फिर एक और सवाल उठता है कि अगर वह 24 सप्ताह तक में गर्भपात करवा सकती है, तो 30 सप्ताह में क्यों नहीं? आखिर वह गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती।
    फैसला सुनाते वक्त जस्टिस बीवी नागरत्ना

    MTP ऐक्ट की व्याख्या कर क्या दिया था फैसला ?

    सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि प्रजनन महिला का अधिकार है। अपने शरीर पर उसकी स्वायत्तता है। सभी महिलाएं 24 हफ्ते वाले नियम के तहत सेफ प्रेग्नेसी खत्म करने की हकदार है। अविवाहित महिला को इससे वंचित करना संवैधानिक तौर पर नहीं टिकने वाला है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) ऐक्ट के तहत रेप के दायरे में मैरिटल रेप भी आएगा। सभी महिलाएं लीगल तरीके से 24 हफ्ते तक की प्रेग्नेसी खत्म करा सकती है।

    कैसे बढ़ता गया दायरा ?
    केंद्र सरकार के कानून ने पहले 20 हफ्ते तक प्रेग्नेंसी खत्म करने की इजाजत दी थी। बाद में 24 हफ्ते तक कुछ विशेष परिस्थिति में इजाजत दी गई। फिर सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2022 को अविवाहिता को भी इस परिभाषा में शामिल किया और मैरिटल रेप को भी इस दायरे में लाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हर महिला प्रजनन का अधिकार रखती है। अब सुप्रीम कोर्ट ने ताजा फैसले में इससे आगे 30 हफ्ते के गर्भ को खत्म करने की इजाजत देते हुए कहा कि नाबालिग की अनिच्छा के बाद उसे मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। इसे बेहद अहम माना जा रहा है।

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