नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने पिछले दिनों भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में निराशा जाहिर करते हुए कहा था कि सिर्फ विकास दर पर फोकस रखने से बात नहीं बनती। गौर से देखें तो इस साल का बजट भी इसी समस्या का शिकार हो गया है। विकास के नाम पर सामाजिक क्षेत्र को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। सामाजिक क्षेत्र पर हो रहे वास्तविक खर्च में लगातार कमी आई है और उसकी भरपाई करने के बदले आवंटन भी कम कर दिया गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, जलापूर्ति से लेकर आवास पर कम खर्च करने का मतलब है लोगों के जीवन स्तर को स्थाई रूप से नीचे जाने पर बाध्य करना।
आंकड़े बताते हैं दावों का सच
सरकार ने स्वास्थ्य के लिए 1.4 लाख करोड़ रुपये तय किए हैं। यह GDP का सिर्फ आधा प्रतिशत है। सरकार खुद कई बार कह चुकी है कि इस खर्च को 2.5% ले जाने की जरूरत है। नैशनल हेल्थ पॉलिसी में भी यही कहा गया है। स्वास्थ्य पर भारत का खर्च पड़ोसी देशों से भी कम है, विकसित देशों की बात ही छोड़ दीजिए। यही हाल शिक्षा का भी है, जिस पर GDP का महज 0.6% खर्च रखा गया है। नैशनल एजुकेशन पालिसी 2020 में कहा गया है कि शिक्षा पर हमें 6% खर्च करना चाहिए।
बजट के आंकड़ों से यह भी साफ होता है कि सरकार जितना दावा करती है, वास्तव में उतना खर्च करती नहीं। कुछ को छोड़कर उसने सामाजिक कल्याण की ज्यादातर स्कीमों में यही किया है। जलजीवन मिशन का हाल तो इतना खराब रहा कि उसने पिछले साल 67,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया था और सिर्फ 17,000 करोड़ ही खर्च कर पाई। यही हाल शहरी और ग्रामीण आवास योजनाओं का रहा। यह प्रशासनिक और वित्तीय, दोनों स्तर की विफलता को दर्शाता है।
रोजगार वाले सेक्टरों पर कम खर्च
सामाजिक क्षेत्रों की अनदेखी को टैक्स ढांचे से जोड़कर देखने पर अंदाजा हो जाएगा कि मोदी सरकार का झुकाव किस ओर है। सरकार की आमदनी का बड़ा हिस्सा आम व्यक्तियों से मिले इनकम टैक्स से आता है। यह राजस्व का 21% है। वहीं, कॉरपोरेट से आमदनी केवल 18% है। सरकार आम लोगों से टैक्स वसूलती है, लेकिन उनके लिए खर्च करने में कतराती है। कॉरपोरेट टैक्स के लगातार घटने और इनकम टैक्स बढ़ने से आमदनी की असमानता काफी बढ़ी है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के मुताबिक, भारत के 10% लोग देश की कुल आमदनी का 58% ले लेते हैं, जबकि देश की 50% आबादी के हिस्से सिर्फ 15% आता है। यह दूरी ज्यादा कमाने वालों पर टैक्स लगाने से मिट सकती है, लेकिन बजट को देख कर लगता है कि सरकार इस ओर कदम बढ़ाने के लिए तैयार नहीं।
रोजगार देने वाले क्षेत्रों पर सरकार कम खर्च कर रही। कृषि पर देश की 46% आबादी निर्भर करती है, पर पिछले साल के मुकाबले इस बार सरकार ने केवल 628 करोड़ रुपये ही ज्यादा दिए हैं। महंगाई को देखें, तो वास्तविक खर्च पहले से कम ही हो जाएगा। कृषि अनुसंधान पर भी खर्च पहले के बराबर है। विश्व प्रतिस्पर्धा और कृषि क्षेत्र को बाहरी देशों के लिए खोलने के दबाव को देखते हुए बजट निराश करता है। रोजगार पर घटते फोकस का अंदाजा इस बात से लगता है कि मनरेगा को गारंटी वाली योजना से सरकारी योजना में बदल दिया गया। बदली योजना पर आवंटन पहले से घटा नहीं है, लेकिन उसे प्रशासनिक फैसलों पर जरूर छोड़ दिया गया है।













