खासकर मिसाइल निर्माण के मामले में भारत की इजरायल पर लगातार बढ़ती निर्भरता को लेकर कई डिफेंस एक्सपर्ट अलार्म बजा रहे हैं। कई जानकारों का मानना है कि मिसाइल डेवलपमेंट के लिए दशकों तक लगातार कोशिश करनी पड़ती है। हालांकि, भारत का अपना अनुभव इस धारणा को साफ तौर पर गलत साबित करता है, क्योंकि भारत ने मिसाइल डेवलपमेंट में जबरदस्त प्रदर्शन किया है। लेकिन फिर भी ज्यादा निर्भरता चिंता की बात होती है।
इजरायली हथियारों पर भारत की बढ़ती निर्भरता
भारत दो से ढाई साल में मिसाइल सिस्टम डेवलप कर सकता है। भारत यह क्षमता इसलिए डेवलप कर सका, क्योंकि भारत ने शुरुआती दौर में ही इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया था। इस प्रोग्राम का मकसद हर कैटेगरी की मिसाइलें देश में ही बनाना और बाहरी निर्भरता कम करना था। इसी वजह से अग्नि, पृथ्वी और आकाश जैसे सिस्टम पूरी तरह से कामयाब रहे।
भारत और इजरायल के बीच प्रमुख मौजूदा/प्रस्तावित समझौते
- Barak-8/MR-SAM (सेना, नौसेना, वायुसेना)
- SPICE प्रिसिजन गाइडेड बम किट
- Air LORA स्टैंड-ऑफ मिसाइल
- Derby / I-Derby एयर-टू-एयर मिसाइल
- Spike Anti-Tank Guided Missile (ATGM)
- विभिन्न UAV और Loitering Munition प्लेटफॉर्म
2000 के दशक में भारत ने एक जरूरी ऑपरेशनल कमी को भरने के लिए इजरायल से बराक एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था। उस समय, यह फैसला लॉजिकल और ऑपरेशन के हिसाब से बिल्कुल सही था। लेकिन अब धीरे धीरे महसूस हो रहा है कि विदेशी निर्भरता, स्वदेशी कार्यक्रमों को लेट करते हैं या उसे कमजोर करते हैं। आज, जब बराक को बदलने का समय आ रहा है, तो भारत के पास उसी कैटेगरी का कोई घरेलू मिसाइल सिस्टम नहीं है। इसी कमी की वजह से भारतीय सेना ने हाल ही में एक बार फिर विदेशी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल को खरीदने की कोशिशें करनी शुरू की हैं। भारत के पास जो स्वदेशी समाधान हैं, वो अभी या तो बहुत कम दूरी वाले सेगमेंट में मौजूद हैं या फिर आकाश और VL-SRS जैसे सिस्टम के तौर पर, जिनकी रेंज कम है। शायद एक वजह ये भी है कि त्रिशूल, MICA जैसे भारत के स्वदेशी कार्यक्रम कमजोर हो गये।
विदेशी हथियारो के साथ एक दिक्कत ये भी होती है कि शुरूआत में खरीददारी, जो आम तौर पर कम संख्या में होती है, उस स्टॉक के खत्म होने के बाद देश की ऑपरेशनल क्षमता तेजी से कम हो जाती है। और फिर उसे भरना काफी मुश्किल होता है और काफी वक्त लगता है। दूसरी तरफ इजरायली हथियारों के साथ एक और बड़ी दिक्कत उनकी सप्लाई चेन को लेकर होती हैं। इजरायल का उसपर काफी सख्त कंट्रोल रहता है। लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के दौरान स्टॉक को फिर से भरने में काफी समय लगेगा, इसीलिए भारतीय प्लानर्स अब एक बहुत ही मुश्किल रणनीतिक फैसले का सामना कर रहे हैं।
भारत में मैन्युफैक्चरिंग दिक्कतें क्या हैं?
भारत की चिंताओं को कम करने के लिए इजरायल ने पिछले कुछ महीनों से भारत में ही प्रोडक्शन शुरू करने का बार बार प्रस्ताव दिया है। लेकिन ऊपर से देखने पर ये भले ही ‘मेक इन इंडिया’ जैसा लगे, लेकिन ज्यादातर ट्रांसफर किए गए प्रोडक्शन के लिए जरूरी सबसिस्टम के बजाय कम कीमत वाले, ज्यादा मात्रा वाले कंपोनेंट शामिल होते हैं। मुख्य टेक्नोलॉजी और जरूरी कंपोनेंट पर पूरी तरह से इजरायल का कंट्रोल रहेगा। एयर लोरा, आइस ब्रेकर, रॉक्स, SPICE, विंड डेमन, डर्बी, स्काईसेप्टर, स्पाइक एंटी-टैंक मिसाइलें, और अलग-अलग UAV प्लेटफॉर्म जैसे सिस्टम इसी मॉडल को फॉलो करते हैं। भारतीय प्राइवेट कंपनियों को असेंबली की क्षमता तो मिलती है, लेकिन उन्हें न तो इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IP) मिलते हैं और न ही उन्हें क्रिटिकल टेक्नोलॉजी मिल पाती है, इसीलिए आत्मनिर्भरता हासिल नहीं हो पाती।













