अवामी लीग की दूरी
देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब शेख हसीना की पार्टी चुनाव में नहीं है। यह अवामी लीग का अपना फैसला नहीं था, बल्कि उस पर थोपा गया। जो पार्टी बांग्लादेश की मुक्ति से लेकर अभी तक, उसके हर राजनीतिक-सामाजिक बदलाव की साक्षी रही है, उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर करना सही तो नहीं कहा जा सकता।
जनमत संग्रह
पाकिस्तान से आजादी मिलने के बाद इस चुनाव को बांग्लादेश के भविष्य के लिहाज से सबसे अहम माना जा रहा है। बहुत कुछ इसके परिणाम पर निर्भर करेगा कि ढाका की अपने देश को लेकर और बाहर भी – खासकर भारत के प्रति नीति क्या रहने वाली है। चुनाव के साथ जुलाई चार्टर को लेकर जनमत संग्रह भी हुआ है। इससे साफ होगा कि बांग्लादेश किस तरह की व्यवस्था में आगे बढ़ता है। ये लाइनें लिखे जाने तक वोटिंग परसेंट करीब 48 था। खबरों के मुताबिक, कई जगह तय समय के बाद भी लाइन लगी थी।
हिंसा की खबरें
चुनाव के पहले बांग्लादेश में जिस तरह के हालात थे, उसे देखते हुए मतदान को काफी हद तक शांतिपूर्ण कहा जा सकता है। कुछ जगहों से हिंसा की खबरें आई हैं। एक जगह बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेता की मौत हुई। हालांकि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा चिंता का विषय है।
जल्द आए परिणाम
अवामी लीग ने चुनाव पर सवाल उठाए हैं, जबकि अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनूस ने इसे सफल बताया है। चुनावों की असल सफलता परिणाम पर निर्भर करेगी। मुख्य रूप से दो ही धड़े हैं – BNP और जमात-ए-इस्लामी। BNP के मुखिया तारिक रहमान ने जल्द और निष्पक्ष परिणाम की अपील की है। अगर परिणाम में देरी होती है या किसी तरह के आरोप लगते हैं, तो तमाम तरह की शंकाएं सिर उठाएंगी।
भरोसा जीतना होगा
BNP या जमात – सत्ता में जो भी आए, उसके ऊपर सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी देश की जनता की ख्वाहिशों को पूरा करने की। अंतरिम सरकार आम लोगों में भरोसा जगाने में असफल रही है। चुनाव में BNP की जीत तय मानी जा रही है। अगर ऐसा होता है तो उसके सामने जनता की कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती होगी।













