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  • बांग्लादेश चुनाव में क्यों लगी है भारत, पाकिस्तान और चीन की नजर, तीनों पड़ोसी देशों के ढाका में क्या हैं हित

    ढाका: बांग्लादेश में इस महीने (12 फरवरी) को आम चुनाव होने हैं। यह अगस्त, 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को हटाए जाने के बाद पहला चुनाव है, जो डेढ़ दशक तक सत्ता में रहीं। बांग्लादेश में 2024 से मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार है। इस चुनावी मुकाबले में दो मुख्य पार्टियां बांग्लादेश


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    By Azad Hind Desk फरवरी 4, 2026
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    ढाका: बांग्लादेश में इस महीने (12 फरवरी) को आम चुनाव होने हैं। यह अगस्त, 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को हटाए जाने के बाद पहला चुनाव है, जो डेढ़ दशक तक सत्ता में रहीं। बांग्लादेश में 2024 से मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार है। इस चुनावी मुकाबले में दो मुख्य पार्टियां बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी (JIB) मानी जा रही हैं। वहीं शेख हसीना की अवामी लीग चुनाव मैदान से बाहर है। इस चुनाव पर बांग्लादेश के लोगों के साथ-साथ तीन पड़ोसी देशों- भारत, पाकिस्तान और चीन की भी नजर लगी हुई है। हम जानेंगे कि तीनों देशों के लिए इस चुनाव में क्या दांव पर लगा है।

    अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के साथ करीबी संबंध रखने वाली अवामी लीग और शेख हसीना इन चुनावों से बाहर हैं। 78 वर्षीय हसीना फिलहाल भारत में निर्वासन में हैं। पिछले साल नवंबर में बांग्लादेश में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने उनको मौत की सजा सुनाई है। हसीना का ढाका से बाहर होने के बाद बांग्लादेश की भू-राजनीतिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया है।

    ढाका के बदलते रिश्ते

    इंडिपेंडेंट यूनिवर्सिटी बांग्लादेश में ग्लोबल स्टडीज और गवर्नेंस के लेक्चरर खोंडाकर ताहमिद रेजवान ने अल जजीरा को बताया, ‘भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में ऐतिहासिक गिरावट आई है। वहीं पाकिस्तान के साथ गर्मजोशी भरा मेल-मिलाप हुआ है। इसके अलावा चीन के साथ भी ढाका के रणनीतिक संबंध काफी गहरे हुए हैं।

    ताहमिद ने आगे कहा, ‘शेख हसीना के 15 साल के कार्यकाल में रही ढाका की विदेश नीति अब बदल गई है। ढाका की पूर्वानुमानित और पैटर्न वाली स्थिति अब भारत और पाकिस्तान के संबंध में उलट गई है और चीन के संबंध में संशोधित हो गई है। ऐसे में भारत, पाकिस्तान और चीन के लिए चुनाव परिणाम बहुत मायने रखते हैं।’

    भारत आने वाले चुनावों को कैसे देखता है?

    अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया के सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन कहते हैं कि हसीना को सत्ता से हटाया गया तो भारत को बड़ा रणनीतिक नुकसान हुआ। भारत वह अंतरिम सरकार से बहुत सहज नहीं है। हालांकि भारत को उम्मीद है कि इस आने वाले चुनाव से ऐसी सरकार बनेगी जो भारत के साथ जुड़ने को तैयार होगी। वह उस तरह के लोगों से प्रभावित नहीं होगी जिनसे भारत को लगता है कि उसके हितों को खतरा है।

    इंडिपेंडेंट यूनिवर्सिटी के खोंडाकर ताहमिद रेजवान कहते हैं, ‘यह संभावना नहीं है कि कोई भी नई सरकार भारत के साथ तनाव को नजरअंदाज करेगी, भले ही उसमें जमात या दूसरी इस्लामी पार्टियां शामिल हों। ढाका की नई सरकार को अपने सबसे बड़े पड़ोसी और भारत जैसी क्षेत्रीय शक्ति को गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरों और आपसी हित के लिए नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।

    जमात बढ़ा सकती है चिंता

    कुगेलमैन को लगता है कि अगर जमात-ए-इस्लामी चुनाव जीतती है तो भारत राजनीतिक और सुरक्षा के नजरिए से चिंतित हो सकता है। वहीं तारिक रहमान की बीएनपी के साथ भारत सहज रहेगा। उन्होंने कहा, ‘बीएनपी का जमात के साथ गठबंधन नहीं है। पार्टी ने भारत के साथ जुड़ने की अपनी इच्छा ज़ाहिर की है।’

    कुगेलमैन ने आगे कहा, ‘मुझे लगता है कि भारत भी बांग्लादेश के साथ टूटे हुए रिश्तों को फिर से जोड़ने के लिए तैयार होगा। भारत यह भी समझता है कि अवामी लीग कुछ समय के लिए राजनीतिक फैक्टर नहीं रहने वाली है। ऐसे में उसे बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार को स्वीकार करने और उसके साथ काम करने को तैयार रहना होगा।’

    चीन-बांग्लादेश संबंध

    हाल के वर्षों में दक्षिण एशिया में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है। चीन ने बांग्लादेश के साथ भी सैन्य और आर्थिक संबंधों को बढ़ाया है। ढाका चुनाव में भी चीन सक्रिय रूप से रुचि ले रहा है। पिछले एक साल से चीनी नेता बांग्लादेश की राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से मिल रहे हैं। इसमें खासतौर से बीएनपी और जमात के नेता हैं।

    कुगेलमैन कहते हैं, ‘चीन चुनावों पर बारीकी से नजर रखेगा क्योंकि वह बांग्लादेश को एक प्रमुख व्यापार और निवेश भागीदार के रूप में देखता है।बीजिंग के लिए ढाका में राजनीतिक स्थिरता बहुत जरूरी है क्योंकि उसने इस क्षेत्र में निवेश किया है। बीजिंग यह पक्का करना चाहता है कि बांग्लादेश में कानून-व्यवस्था की चुनौतियां और सुरक्षा चिंताएं जमीनी पर चीनी हितों पर असर ना डालें।

    भारत को रोकना चाहेगा चीन

    रेजवान का कहना है कि चीन के लिए यह चुनाव महत्वपूर्ण हैं क्योंकि बांग्लादेश का दक्षिण एशिया पर रणनीतिक प्रभाव है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे लंबे समय से भारत का प्रभाव क्षेत्र माना जाता रहा है। चीन ने ढाका में कोई पक्ष नहीं चुना है लेकिन जब चुनाव नतीजों की बात आती है। चीन की कोई स्पष्ट पसंदीदा नहीं है। उसके सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ करीबी संबंध हैं।

    उन्होंने कहा, ‘जो भी जीतेगा, चीन उस सरकार को पूरा समर्थन देगा और दूसरी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के साथ भी बातचीत बनाए रखेगा। चीन की कोशिश होगी कि वह किसी भी बांग्लादेशी पार्टी पर अमेरिकी प्रभाव ना हो, जो चुनावों में बहुमत हासिल करती है और सरकार बनाती है। वहीं भारत का प्रभाव भी चीन कम करना चाहेगा।

    पकिस्तान की क्यों लगी चुनाव पर नजर

    शेख हसीना को हटाए जाने के बाद से बांग्लादेश के साथ पाकिस्तान के संबंध बेहतर हुए हैं। 1971 में पाकिस्तान से अलग हुए बांग्लादेश के लोगों में इस्लामाबाद को लेकर गुस्सा हालिया महीनों में कम होता दिखा है। हालांकि बांग्लादेश पाकिस्तान से 1971 के अत्याचार के लिए माफी की मांग पर कायम है लेकिन रिश्ते भी बेहतर कर रहा है।

    इंडिपेंडेंट यूनिवर्सिटी के रेजवान कहते हैं, ‘पाकिस्तान मुख्य रूप से बांग्लादेश के साथ अपनी रक्षा और सांस्कृतिक कूटनीति का विस्तार करके घनिष्ठ द्विपक्षीय संबंध विकसित करना चाहता है। अपनी आर्थिक चुनौतियों के चलते उसके पास व्यापार और निवेश में बांग्लादेश को देने के लिए बहुत कम है। वह ढाका के साथ घनिष्ठ रणनीतिक संबंध विकसित करके भारत की पूर्वोत्तर में सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाना चाहता है।

    पाकिस्तान चुनावों को कैसे देखेगा?

    कुगेलमैन के अनुसार, ‘पाकिस्तान आने वाले चुनावों में दो मुख्य पार्टियों में से किसी के भी सत्ता में आने से खुश होगा लेकिन जमात की जीत उसे सबसे अच्छी लगेगी। पाकिस्तान साफ तौर पर एकमात्र क्षेत्रीय खिलाड़ी होगा, जो इस्लामिस्ट जमात सरकार को सबसे ज्यादा पसंद करेगा। हालांकि बीएनपी नेतृत्व वाली सरकार के साथ भी पाकिस्तान नाखुश नहीं होगा।

    कुगलमैन कहते हैं, ‘इस्लामाबाद यह पक्का करने की कोशिश करेगा कि बीएनपी के भारत के साथ संबंध ना सुधरें। इससे बांग्लादेश के साथ बेहतर संबंध बनाने की दिशा में इस्लामाबाद की कोशिशें कमजोर हो जाएंगी। बीएनपी पाकिस्तान के साथ सहयोग के सभी रास्ते खुले रखेगी लेकिन इस्लामाबाद पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं होगी। वहीं जमात को इस्लामाबाद शायद ज्यादा अपनी मर्जी से चला सकेगा।

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