जनरल जमां ने तारिक रहमान सरकार के साथ मिलकर काम करने से पहले 12 फरवरी के चुनाव खत्म होने का सब्र से इंतजार किया और इसका फल उनको मिला है। नॉर्थईस्ट न्यूज के मुताबिक, जनरल जमां के अंडर आर्मी पर पूरे अधिकार की दो रूकावटें खत्म हो गई है। पहला पूर्ण पॉलिटिकल सरकार बन गई है। दूसरा एनएसए सेक्रेटेरिएट के जरिए मोहम्मद यूनुस के अंतरिम शासन की ओर से मिलिट्री पर लगाया गया ओवरसाइट और मॉनिटरिंग सिस्टम खत्म किया गया है।
जनरल जमां की बढ़ी ताकत
आर्मी चीफ जमां अपने भरोसेमंद लेफ्टिनेंट जनरल मैनुर्रहमान को फोर्स में दूसरी सबसे जरूरी पोस्ट चीफ ऑफ जनरल स्टाफ (CGS) पर अपॉइंट होते देखकर राहत महसूस कर रहे हैं। खासतौर से एनएसए खलीलुरर्हमान ने जमां के लिए मुश्किल पैदा की और कई मौकों पर आर्मी हेडक्वार्टर में लिए गए फैसलों को NSA ऑफिस ने पलट दिया।
पूर्व NSA और मौजूदा विदेश मंत्री खलीलुर्रहमान और लेफ्टिनेंट जनरल कमरुल हसन की आर्मी के अंदर निगरानी ने मिलिट्री के अंदर असंतोष पैदा किया। खलील का ऑफिस असल में एक वैकल्पिक आर्मी हेडक्वार्टर के तौर पर काम करने लगा था। प्रमोशन और ट्रांसफर के अलावा खलील ने मिलिट्री खरीद और दूसरे पॉलिसी मामलों में दखल देने के लिए कमरुल का इस्तेमाल किया।
जमां और खलील की तनातनी
खलील की ओर से जनरल जमां को अस्थिर करने की कई कोशिशें की गईं। उन्हें सीनियर अधिकारियों के साथ बार-बार मीटिंग करके असहज स्थिति को संभालना पड़ा। एक समय पर खलीलुर्रहमान को ढाका कैंटोनमेंट में अनऑफिशियली पर्सोना नॉन ग्राटा घोषित कर दिया गया था। फिलहाल जनरल जमां को उस शर्मनाक स्थिति से राहत मिल गई है।
खलीलुर्रहमान के NSA के पद से हटाने के बाद आर्मी के ऊंचे लेवल पर बड़े फेरबदल हुए। लेफ्टिनेंट जनरल मैनुर्रहमान को CGS अपॉइंट किया गया। PSO लेफ्टिनेंट जनरल कमरुल हसन को विदेश मंत्रालय में राजदूत के तौर पर काम दिया गया। ब्रिगेडियर कैसर राशिद को मेजर जनरल के पद पर प्रमोट किया गया और DGFI का डायरेक्टर जनरल बनाया गया।
आर्मी का जमातीकरण हुआ कम
आर्मी के टॉप पोस्ट पर हालिया बदलावों के बाद ‘जमातीकरण’ काफी हद तक कम हो गया है और जनरल जमां की ‘कमांड’ फिर से बहाल हो गई है। जनरल जमां आर्मी को एक प्रोफेशनल फोर्स में बदलने की अपनी एक्टिव कोशिशों के लिए आम सैनिकों के बीच पॉपुलर हैं।
जमां ने अक्सर कहा है कि वह सिविल एडमिनिस्ट्रेशन की मदद के लिए तैनात सैनिकों को जल्दी से बैरक में वापस भेजना चाहते हैं। हालांकि ‘नाजुक’ कानून-व्यवस्था की स्थिति के कारण चुनाव के बाद राजनीतिक सरकार बनने के बाद भी सेना अभी तक बैरक में वापस नहीं लौटी है।












