संडे गार्जियन के मुताबिक, बंगाल की खाड़ी में तिकोनी खींचतान देखने को मिलेगी। इससे भारत के लिए जमीनी और समुद्री सीमाओं पर सुरक्षा चिंता बढ़ेगी। पश्चिम बंगाल, असम और सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के इलाकों को लेकर भारत की अंदरूनी सुरक्षा और समुद्री स्थिति पर फिक्र बढ़ सकती है। इसकी एक अहम वजह जमात-ए-इस्लामी की बढ़ी हुई ताकत है।
बंगाल की खाड़ी में ट्रायंगल
शेख हसीना के डेढ़ दशक के शासन में बांग्लादेश ने एक सीमित बैलेंसिंग एक्ट अपनाया था। उन्होंने चीन के साथ गहरे आर्थिक और मिलिट्री रिश्ते रखे, सुरक्षा पर भारत के साथ राजनीतिक रूप से मजबूत तालमेल बनाया। वहीं डेमोक्रेसी और ह्यूमन राइट पर अमेरिका के साथ उनका एक तनावपूर्ण शर्तों वाला रिश्ता रहा।
हसीना के शासन में बना ढांचा अगस्त 2024 में उनकी सत्ता जाने के बाद बदल गया है। इस बदलाव ने 2026 के चुनाव के लिए माहौल तैयार किया, जिसे BNP की भारी जीत और बॉर्डर बेल्ट में जमात के मजबूत प्रदर्शन में देखा गया। यह दिखाता है कि बंगाल की खाड़ी का पूरा मामला ग्लोबल राइवलरी से कैसे जुड़ा हुआ है।
चीन और अमेरिका के बीच रहमान
तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी ने अमेरिका केसाथ संबंधों को फिर से ठीक करने की इच्छा का संकेत दिया है। अमेरिका ने भी अवामी लीग के साथ तनाव से आगे बढ़ते हुए बीएनपी को समर्थन दिया है। अमेरिका ने बंगाल की खाड़ी में चीन की बढ़ती पकड़ का मुकाबला करने की कोशिश के तहत चुपचाप विरोधी ताकतों का साथ दिया है।
चीन ने बीएनपी और जमात यानी बांग्लादेश की सभी बड़ी पार्टियों के साथ सावधानी से रिश्ते बनाए हैं। BNP के चीन से रिश्ते अवामी लीग की सरकार के समय भी रहे। ऐसे में रहमान की कोशिश चीनी कैपिटल और मिलिट्री सप्लाई लाइनों को बनाए रखते हुए अमेरिका और पश्चिमी देशों के जुड़ाव के लिए राजनीतिक और आर्थिक जगह खोलना होगा।
भारत के लिए क्या है अर्थ
बंगाल की खाड़ी का भारत के लिए निश्चित तौर पर काफी ज्यादा महत्व है। ऐसे में चीन और अमेरिका के साथ भारत भी यहां अपनी जोर आजमाइश करेगा। खासतौर से BNP की वापसी, जमात के उभार और चीन-अमेरिका की रस्साकशी से बंगाल की खाड़ी की स्ट्रेटेजिक रणनीति को बदलेगा, जिससे भारत पर प्रभाव पड़ेगा।
भारत के लिए नए माहौल में मुश्किल के साथ मौके भी हैं। ऐसा माहौल, जहां चीन और अमेरिका जोरदार मुकाबला कर रहे हैं। भारत अपनी नजदीकी, एनर्जी संबंधों और शेयर्ड रिवर सिस्टम का फायदा उठाकर ढाका के लिए जरूरी बना रह सकता है। हालांकि भारत के सामने नई सरकार से संबंध सुधारने की चुनौती है।













