भौतिक जगत में विद्यमान क्रियाशील ऊर्जाओं की समझ ने ही हमारे भौतिक जीवन को एक आयाम दिया। ज्योतिष के प्रचलित सिद्धांतों के अनुसार जिस समय नवजात शिशु का जन्म इस पृथ्वी पर होता है, उस उदीयमान क्षितिजस्थ भचक्र बिंदु पर ग्रहों का शुभाशुभ योग, दृष्टि, स्थिति आदि जो प्रभाव डालती है, उसी का प्रतिफल नवजात शिशु (जातक) को इस पृथ्वी पर जीवन भर मिलता है। इसी कारण ही तत्कालीन ग्रह स्थिति जन्मकुण्डली ही सम्बन्धित प्राणी के भावी फलादेश का आधार बनती है। ग्रह दशा, गोचर आदि सिद्धान्तों के माध्यम से कॉस्मिक ऊर्जा को समझा जा सकता है।
अद्वैत वेदांत के अनुसार, सब कुछ एक ही सत्य से उत्पन्न होता है और सब कुछ उसी में विलीन हो जाता है। यह विचार हमें यह सिखाता है कि हम सभी ब्रह्मांड के एक ही पदार्थ से बने हैं और हम सब एक ही ऊर्जा के अभिन्न अंग हैं। ब्रह्मांड और आत्मा दोनों ही एक ही शाश्वत चेतना या कॉस्मिक ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं। हर जीवात्मा ब्रह्म का ही एक अंश है, और इसलिए हम सब एक ही शाश्वत सत्य से जुड़े हुए हैं। ब्रह्मा को सृष्टि का निर्माता माना जाता है, वे सभी जीवों और वस्तुओं के उत्पत्ति का स्रोत हैं।
विष्णु को सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में माना जाता है, वे संपूर्ण ब्रह्मांड की व्यवस्था और संतुलन बनाए रखते हैं। शिव को संहार और पुनर्जन्म का प्रतीक माना जाता है। वे समय के अंत के साथ जुड़े होते हैं और पुरानी चीजों को नष्ट करके नए सृजन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। शिव को ब्रह्मांडीय समय का प्रतीक माना जा सकता है, जो संहार और पुनर्जन्म के चक्र को दर्शाता है। समय का यह चक्र निरंतर चलता रहता है और यह ब्रह्मांड के अस्तित्व और परिवर्तन का महत्वपूर्ण पहलू है। कॉस्मिक एनर्जी, कॉस्मिक स्पेस और कॉस्मिक टाइम पर शोध करने वाले आध्यात्मिक वेत्ता इन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश के स्वरूप से परिभाषित करते हैं।













