किसने दी है यह महत्वपूर्ण याचिका
गैर सरकारी संगठन ‘यूथ फॉर इक्वालिटी फाउंडेशन’ द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन के माध्यम से दायर याचिका में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ को बताया गया कि के कृष्ण मूर्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट की 5 न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था-‘सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन जरूरी नहीं कि राजनीतिक पिछड़ेपन के समान हो।’
CJI सूर्यकांत की पीठ ने और क्या कहा
सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि वह इस मुद्दे की जांच करने को तैयार है, लेकिन प्रथम दृष्टया हमें लगता है कि पीबीसी (पब्लिक-बैक्ड) वर्ग के लोग सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) से ही होने चाहिए। यदि एसईबीसी समुदायों में प्रतिनिधित्व कम है… तो उन्हें पीबीसी के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, लेकिन इसका उल्टा सच नहीं है।
‘किसी राज्य ने PBC की पहचान नहीं की’
2010 में पांच न्यायाधीशों की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा था-इस संबंध में राज्य सरकारों को अपनी आरक्षण नीतियों को पुनर्गठित करने की सलाह दी जाती है, जिसमें अनुच्छेद 243-डी(6) और 243-टी(6) के तहत लाभार्थियों को अनुच्छेद 15(4) के उद्देश्य से एसईबीसी के साथ या सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व वाले पिछड़े वर्गों के साथ समान रूप से वर्गीकृत करना आवश्यक नहीं है।
स्थानीय स्वशासन में आरक्षण पर नए सिरे से सोचने की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने तब कहा था-यह कहना उचित होगा कि शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में जिन समूहों को आरक्षण का लाभ मिला है, उन सभी को स्थानीय स्वशासन के क्षेत्र में आरक्षण की आवश्यकता नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि राजनीतिक भागीदारी में आने वाली बाधाएं शिक्षा और रोजगार तक पहुंच को सीमित करने वाली बाधाओं के समान नहीं हैं। इसलिए स्थानीय स्वशासन में आरक्षण के संबंध में नए सिरे से सोचने और नीति निर्माण की आवश्यकता है।
केवल SEBC को ही आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र मिले
शंकरनारायणन ने कहा कि 15 साल बीत जाने के बावजूद किसी भी राज्य ने सार्वजनिक पिछड़ा वर्ग (PBC) समुदायों की पहचान करके निर्वाचन क्षेत्रों को आरक्षित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू करने का कोई प्रयास नहीं किया है और केवल एसईबीसी समुदायों को ही आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र प्रदान किए हैं। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने इस मुद्दे का परीक्षण करने पर सहमति जताई और महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा।














