डेली मेल की एक रिपोर्ट बताती है कि तालिबान ने एक पुराने बेस का इस्तेमाल कामिकेज ड्रोन की ‘एयर फोर्स’ बनाने के लिए किया। तालिबान ने अफगानिस्तान में ब्रिटिश स्पेशल फोर्स के इस्तेमाल में रहे लोगर प्रांत के बेस का इस्तेमाल ड्रोन टेस्ट साइट के तौर पर किया। यहां उसने अपने देश की सीमाओं के बाहर हमला करने वाला ड्रोन बनाया। ड्रोन प्रोग्राम में उसे तुर्की से लेकर चीन, ईरान तक कई देशों की मदद मिली।
तालिबान ने सत्ता में लौटकर शुरू किया ड्रोन प्रोग्राम
डेली मेल ने बीते साल इंटेलिजेंस सूत्रों के हवाले से बताया था कि काबुल के दक्षिण में लोगर प्रोविंस में पुराने SAS बेस पर ‘सुसाइड या कामिकेज’ वॉरप्लेन के सफल टेस्ट किए। ये ड्रोन अपने टारगेट से टकराते ही फट जाते हैं। तालिबान डेवलपर्स ने ड्रोन मॉडल कॉपी के लिए MQ9 रीपर, अमेरिकन सिस्टम और ईरानी शाहेद का इस्तेमाल किया।
तालिबान ने अपने इस प्रोजेक्ट पर शिद्दत से काम किया ताकि वह सीमाओं के बाहर दुश्मनों पर हमला करने में कैपेबल एडवांस्ड ड्रोन बना सके। तालिबान ने इसके लिए अमेरिका और ब्रिटिश सैनिकों के साथ काम करने वाले कुछ इंजीनियरों से भी संपर्क किया और इन देशों की ड्रोन तकनीक को समझने की कोशिश की।
चीन और तुर्की से लाए गए पार्ट
इंटेलिजेंस अधिकारियों ने बीते साल दावा किया था कि अफगानिस्तान में अमेरिका और यूके की सेनाएं लंबे समय तक रही हैं। ऐसे में तालिबान के पास इन सेनाओं से जुड़े कुछ हथियार और तकनीक हैं। इसका फायदा उनको ड्रोन बनाने में मिल रहा है। तालिबान अपने ड्रोन प्रोग्राम में खासतौर से तुर्की, चीन, रूस, बेलारूस और बांग्लादेश की एक्सपर्टीज का इस्तेमाल कर रहा है।
इंटेलिजेंस सूत्र यह भी कहा कि एक रूसी टीम ने ड्रोन प्रोग्राम के लिए तलिबान की मदद की है। खासतौर से रूसी एक्सपर्ट तालिबान इंजीनियरों के साथ दूसरे देशों में फैक्ट-फाइंडिंग ट्रिप पर गया। तालिबान अधिकारियों ने ड्रोन के पार्ट चीन और तुर्की से खरीदे। तालिबान के पाकिस्तान पर हमले से लगता है कि उसकी खतरनाक ड्रोन बनाने की कोशिश कामयाब रही है।












