नियुक्ति से पहले ही गोर ने किया था भारत का दौरा
सर्जिओ गोर की ने बीती 14 जनवरी को अपने क्रेडेंशियल सौंपे और पद संभाला था। लेकिन औपचारिक तौर पर पद संभालने से कहीं पहले वो अक्टूबर महीने में ही दिल्ली का दौरा कर चुके थे। डिप्लोमैटिक प्रोटोकॉल में ये बहुत सामान्य प्रैक्टिस नहीं है। इस दौरान वो पीएम मोदी के अलावा विदेश मंत्री जयशंकर और वाणिज्य विभाग के उच्च नेतृत्व से मिले थे। पीएम मोदी के साथ अपनी मुलाकात के दौरान गोर ने उन्हें एक तस्वीर भेंट की थी। ये तस्वीर बीते साल पीएम मोदी और राष्ट्रपति की एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ी थी। इसमें पीएम मोदी के लिए एक संदेश भी था।
टाइमिंग रही अहम, संवादहीनता को पाटा
बीते साल अगस्त में राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया अकाउंट पर इस बात का ऐलान किया था कि गोर भारत के अगले राजदूत होंगे, ये घोषणा ऐसे वक्त हुई जबकि ट्रेड डील को लेकर दोनों देशों के रिश्ते असहज थे। बीते कई महीनों में अमेरिका और भारत के बीच इस मसले पर किस तरह संवादहीनता रही है, इसका अदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत ने बार- बार राष्ट्रपति ट्रंप के विवादित बयानों को खारिज किया। बीते दिनों अमेरिका के कॉमर्स मंत्री हार्वर्ड लुटनिक ने यहां तक कहा था कि अमेरिका के साथ भारत की डील इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि पीएम मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप को फोन नहीं किया था। गोर ने दिल्ली- वाशिंगटन के बीच इस संवादहीनता को कम करने की कोशिश की।
ट्रंप गोर पर क्यों करते हैं भरोसा
ट्रंप के खासमखास रहे गोर को व्हाइट हाउस का प्रभावशाली इनसाइडर माना जाता है। खुद ट्रंप ने ही कहा है कि गोर ने बहुत कम समय में करीब 4 हजार लोगों को सरकार विभागों में नियुक्त कर उनके एजेंडे को आगे बढ़ाया है। यही वजह है कि जब पूर्व एंबेसेडर एरिक गार्सेटी ने बीती जनवरी में दिल्ली का दफ्तर छोड़ा था, तो इस पद पर सही उम्मीदवार चुनने में ट्रंप ने सात महीने लगाए और अगस्त में दुनिया को बताया कि वो गोर को दिल्ली भेज रहे हैं।
कैसे व्यवहारिक डिप्लोमेसी ने डील को दिया अंजाम
जिस तरह से राष्ट्रपति ट्रंप ने बीते साल सत्ता में आने के बाद टैरिफ को रणनीतिक और कूटनीतिक हथियार बनाया, उससे अछूता भारत भी नहीं रह पाया। ऐसे में भारत ने अपनी व्यापारिक साझेदारियों में विविधता तलाशनी की कोशिश की। यूके के साथ एफटीए और उसके बाद EU के साथ भारत की व्यापार डील को इसी कड़ी की तरह देखा गया। अमेरिका के साथ चली व्यापार वार्ता में कई तरह के मुश्किल दौर भी सामने आए। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से विवादित बयानों को लेकर नई दिल्ली में एक खामोशी ही रही।
EU डील के बाद US के साथ डील को गति
जानकारों का मानना है कि ईयू के साथ भारत की हाल ही में सपन्न हुई ट्रेड डील को वाशिंगटन में बहुत ध्यान से देखा गया। दोनों पक्षों की ओर से इस डील के जरिए अमेरिका को संदेश दिया गया कि आर्थिक रिश्तों में विविधता आने वाले वक्त की जरूरत है, और दोनों पक्ष किसी भी देश पर निर्भरता से बचना चाहते हैं और दिखाना चाहते हैं कि दोनों के पास और भी विकल्प हैं। हालांकि जानकार इस बात पर संदेह जताते हैं कि भारत पूरी तरह से रूसी तेल खरीदने पर रोक से मान गया है। क्योंकि तेल में खरीद में कमी करने के बावजूद भारत ने कभी राष्ट्रपति ट्रंप के इस दावे को स्वीकारा नहीं है।
व्यवहारिक डिप्लोमेसी और संयमित प्रतिक्रिया
भारी भरकम टैरिफ और राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों के बीच भारत के लिए सयंमित प्रतिक्रिया देना एक चुनौती रहा। भारत ने विवादित बयानों को लेकर हमेशा ही कहा कि दोनों देशों के गहरे संबंध हैं और रिश्तों में उतार चढ़ाव आते रहे हैं। इस बीच चीन और रूस के साथ व्यवहारिक विदेश नीति पर काम करते हुए भारत ने दिखाया कि वो ग्लोबल साउथ की वृहद साझेदारी का हिस्सा है। तियानजिन में राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से शी जिनपिंग, पुतिन और पीएम मोदी की तस्वीर पर ट्रंप की असहजता ने इस पर तस्दीक भी कर दी।
संबंध अब किस राह पर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में ट्रेड डील की असमंजसता ने दोनों देशों के बीच एक ऐसा गतिरोध सामने खड़ा कर दिया था, जिसके पार द्विपक्षीय संबंधों के बहुआयामी सहयोग को लेकर जाना बहुत मुश्किल लग रहा था। यही वजह है कि बीते साल फरवरी में वॉशिंगटन की यात्रा के बाद से पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप एक मंच पर नहीं दिखे। आसियान समिट और गाजा शांति योजना को लेकर हुई शर्म अल शेख समिट में भी पीएम की गैरमौजूदगी को इसी तरह देखा। हालांकि अब ट्रेड डील के बाद माना जा रहा है कि दोनों देशों के संबंधों में गहराई आएगी। दोनों तकनीक और एआई के क्षेत्र में करीब आएंगे। सूत्रों के मुताबिक भारत अमेरिकी पहल पैक्स सिलिका का भी हिस्सा बन सकता है।













