• National
  • भारत का बढ़ता कद, फीके पड़े ट्रंप के तेवर, जानें क्यों मुश्किल था DEAL से बच पाना

    लेखक: शान्तेष कुमार सिंहअमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का भारत पर लगाए गए टैरिफ को घटाकर 18% करना केवल व्यापारिक रियायत नहीं, नई दिल्ली की बदलती कूटनीतिक हैसियत, बहुपक्षीय सक्रियता और वैश्विक शक्ति संतुलन में उसकी केंद्रीय भूमिका का संकेत है। यह कदम भारतीय निर्यातकों को तत्काल राहत देता है, लेकिन साथ ही ऊर्जा आयात और


    Azad Hind Desk अवतार
    By Azad Hind Desk फरवरी 4, 2026
    Views
    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement
    लेखक: शान्तेष कुमार सिंह
    अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का भारत पर लगाए गए टैरिफ को घटाकर 18% करना केवल व्यापारिक रियायत नहीं, नई दिल्ली की बदलती कूटनीतिक हैसियत, बहुपक्षीय सक्रियता और वैश्विक शक्ति संतुलन में उसकी केंद्रीय भूमिका का संकेत है। यह कदम भारतीय निर्यातकों को तत्काल राहत देता है, लेकिन साथ ही ऊर्जा आयात और टैरिफ बाधाओं में बदलाव की शर्तें लगाता है।

    रणनीतिक अहमियत

    यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब भारत ने यूरोप के साथ बहुचर्चित ‘गोल्डन डील’ को अंतिम रूप दिया है, BRICS की अध्यक्षता संभाली है और QUAD जैसे मंचों पर अमेरिका के साथ रणनीतिक सहयोग को नई दिशा दी है। इन सभी घटनाक्रमों ने मिलकर ट्रंप प्रशासन को यह स्वीकार करने पर विवश किया कि भारत अब केवल एक उभरता बाजार नहीं, एक अनिवार्य रणनीतिक साझेदार है।

    EU से डील

    भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए समझौते ने वैश्विक व्यापार समीकरणों को झकझोर दिया है। इस समझौते के तहत भारत को यूरोपीय बाजारों में टेक्सटाइल्स, ग्रीन टेक्नॉलजी, फार्मा और डिजिटल सेवाओं में व्यापक पहुंच मिलेगी। वहीं, यूरोप के लिए भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश का अवसर खुलेगा।

    अमेरिका पर दबाव

    इस डील ने अमेरिका को स्पष्ट संदेश दिया कि अगर उसने कठोर व्यापारिक रुख अपनाया, तो भारत के पास विकल्प मौजूद हैं। यही वह क्षण था, जब भारत की रणनीतिक स्वायत्तता केवल सिद्धांत न रहकर व्यावहारिक शक्ति के रूप में उभरी। ट्रंप का टैरिफ घटाने का फैसला आंशिक रूप से इसी प्रतिस्पर्धी दबाव का परिणाम माना जा सकता है।

    कूटनीतिक मजबूती

    भारत की BRICS अध्यक्षता ने उसकी कूटनीतिक स्थिति को और सुदृढ़ किया है। यूक्रेन युद्ध, वैश्विक ऊर्जा संकट और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था की आलोचना के बीच BRICS एक वैकल्पिक मंच के रूप में उभर रहा है। भारत ने अध्यक्ष के रूप में ग्लोबल साउथ की चिंताओं – ऊर्जा सुरक्षा, ऋण राहत और सप्लाई चेन में विविधता को केंद्र में रखा। अमेरिका के लिए यह स्पष्ट था कि भारत को अलग-थलग करना या उस पर अत्यधिक दबाव डालना उसे BRICS के भीतर और अधिक सक्रिय व पश्चिम से दूर कर सकता है। ऐसे में टैरिफ कट को भारत को ‘सिस्टम के भीतर’ बनाए रखने की रणनीति के रूप में भी देखा जा सकता है।

    इसलिए राजी हुआ US

    • EU से डील ने दिखाया कि भारत के पास विकल्प मौजूद
    • भारत के बिना अधूरी अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति
    • नई दिल्ली के BRICS में ज्यादा सक्रिय होने का भी डर

    QUAD पर असर

    भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का साझा मंच QUAD केवल सुरक्षा ही नहीं, इंडो-पैसिफिक में आर्थिक स्थिरता, तकनीकी सहयोग और सप्लाई चेन में लचीलेपन का आधार बन चुका है। भारत इस मंच का भौगोलिक और नैतिक केंद्र है। चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में उसकी भूमिका अपरिहार्य है। ट्रंप प्रशासन भली-भांति जानता है कि यदि भारत व्यापारिक असंतोष के कारण QUAD में ठंडा रुख अपनाता है, तो अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति कमजोर पड़ सकती है।

    रूस से रिश्ता

    रूसी तेल पर भारत की निर्भरता को लेकर अमेरिका का दबाव इस पूरे घटनाक्रम का सबसे विवादास्पद पहलू है। भारत ने सस्ते रूसी तेल से न केवल अरबों डॉलर की बचत की, बल्कि घरेलू महंगाई को भी नियंत्रित रखा। अब इस निर्भरता को घटाकर अमेरिकी और अन्य स्रोतों से आयात बढ़ाने का वादा आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण है। फिर भी भारत इसे समर्पण नहीं, बल्कि बीच का रास्ता मानता है। थोड़ी देर की मुश्किल के बाद आगे चलकर अलग-अलग ऊर्जा विकल्प मिलेंगे, गैस की सुविधाएं बढ़ेंगी और ग्रीन एनर्जी में निवेश तेज होगा।

    कृषि में चुनौती

    टैरिफ कट से भारतीय निर्यातकों को तत्काल राहत मिली है। जेवरात, टेक्सटाइल्स और फार्मा जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त से राजस्व बढ़ेगा और रोजगार के मौके बनेंगे। इससे अगले कुछ बरसों में लाखों नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं। हालांकि अमेरिकी कृषि और ऊर्जा उत्पादों पर शून्य टैरिफ घरेलू किसानों व MSME के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकते हैं। सरकार को संतुलन साधने के लिए सब्सिडी सुधार, निर्यात प्रोत्साहन और कौशल विकास पर विशेष ध्यान देना होगा।

    सौदेबाजी क्षमता

    आलोचक इसे अमेरिकी दबाव के आगे झुकना कह सकते हैं, लेकिन व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह निर्णय भारत की सौदेबाजी क्षमता को दर्शाता है। भारत ने न तो रूस से संबंध तोड़े, न ही यूरोप और BRICS में अपनी स्वतंत्र भूमिका छोड़ी। इसके विपरीत, उसने बहुपक्षीय मंचों का उपयोग कर अमेरिका को यह समझाया कि सहयोग ही व्यावहारिक रास्ता है।

    संतुलित रही नीति

    ट्रंप का टैरिफ कट भारत की कूटनीतिक विजय है। ऐसी जीत जो टकराव नहीं, संतुलन से हासिल हुई। यदि यह संतुलन बना रहा, तो भारत वैश्विक नेतृत्व में भी नई ऊंचाइयों को छू सकता है। यह डील लंबे समय तक फायदेमंद बने, इसके लिए नीतिगत सतर्कता अनिवार्य है। भारत की विदेश नीति एक बार फिर सिद्ध करती है कि रणनीतिक स्वायत्तता ही सच्ची शक्ति है।
    (लेखक JNU के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में प्रोफेसर हैं)

    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement

    हर महीने  ₹199 का सहयोग देकर आज़ाद हिन्द न्यूज़ को जीवंत रखें। जब हम आज़ाद हैं, तो हमारी आवाज़ भी मुक्त और बुलंद रहती है। साथी बनें और हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा दें। सदस्यता के लिए “Support Us” बटन पर क्लिक करें।

    Support us

    ये आर्टिकल आपको कैसा लगा ? क्या आप अपनी कोई प्रतिक्रिया देना चाहेंगे ? आपका सुझाव और प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण है।