भारत ने पाकिस्तान को दी कड़वी गोली
दरअसल, अफगानिस्तान में दवाइयों का बाजार तेजी से बदल रहा है। यहां पहले पाकिस्तान की दवाइयां खरीदी जाती थीं। पाकिस्तानी दवा कंपनियों का यहां दबदबा था। हालांकि, अब हालात तेजी से बदल रहे। अब वहां भारत की दवाइयां पाकिस्तानी दवानों की जगह ले रही हैं। यह बदलाव हाल के महीनों में हुए राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रमों का नतीजा है। एक अफगानी ब्लॉगर फजल अफगान ने अपने अनुभव से बताया कि कैसे उन्हें भारतीय दवाइयां पाकिस्तान या तुर्की दवाओं से चार गुना सस्ती मिली हैं। उन्होंने इन दवाओं को खरीदा और इसके नतीजे भी काफी बेहतर रहे हैं।
अफगानिस्तान से जुड़ा कनेक्शन क्या है
फजल अफगान ने एक्स पर पोस्ट में बताया कि अफगानिस्तान में वे पारोल खरीदने गए थे, जो पाकिस्तान और तुर्की में पैरासिटामोल दवा से जुड़ा एक ब्रांड है। जब वो इसे खरीदने की कोशिश कर रहे थे, तो उन्हें फार्मासिस्ट ने बताया कि उन्हें भारतीय दवा कंपनी से इसी तरह की गोलियां मिल सकती हैं। ये पाकिस्तानी या तुर्की दवाओं के मुकाबले करीब चार गुना सस्ती हैं। उन्होंने एक्स पर लिखा कि जब मैं तुर्की पैरासिटामॉल की 10 गोलियों का पैकेट मांगा तो इसकी कीमत 40 अफगानी रुपये थे। फिर दुकानदार ने मुझे भारत में बनी पैरासिटामोल को दिखा। इसमें मात्रा वही थी, लेकिन कीमत सिर्फ 10 अफगानी मुद्रा थी। उन्होंने मुझे यह भी बताया कि भारतीय दवाएं उन अन्य दवाओं की तुलना में बेहतर रिजल्ट देती हैं।
कैसे फार्मा सेक्टर में भारत ने ली बढ़त
फजल अफगानी ने बताया कि भारतीय दवा की कीमत से आकर्षित होकर उन्होंने तुरंत इसे खरीद लिया। उन्होंने लिखा कि इससे उनका सिरदर्द जल्दी ठीक हो गया। इसके बाद उन्होंने ये भी बताया कि कैसे भारतीय दवाएं अफगानिस्तान में धीरे-धीरे पाकिस्तानी दवाओं की जगह ले रही हैं।
अब तक अफगानिस्तान के दवा बाजार में पाकिस्तान की हिस्सेदारी काफी ज्यादा थी। हालांकि, हाल के समय में दोनों देशों के बीच जिस तरह से कई झड़प हुई, इससे दवा बाजार में इसका असर नजर आ रहा। अफगानिस्तान में पाकिस्तान दवाओं की खरीद में कमी नजर आ रही।
अफगानिस्तान में पाकिस्तान को झटके की इनसाइड स्टोरी
एक्सपर्ट के मुताबिक, यहां के बाजार में पाकिस्तानी हिस्सेदारी 2024 से घट रही थी। इसी बीच अक्टूबर-नवंबर 2025 में हुई कई झड़पों के बाद, अफगानिस्तान के उप-प्रधानमंत्री अब्दुल गनी बरादर ने खराब गुणवत्ता का हवाला देते हुए पाकिस्तानी दवाओं पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया और व्यापारियों से भारत, ईरान और मध्य एशिया से विकल्प तलाशने का आग्रह किया। इसी समय, अफगानिस्तान को भारतीय दवा निर्यात तेजी से बढ़ा। नई दिल्ली ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में काबुल को 108 मिलियन डॉलर की दवाएं भेजीं, और 2025 के बाकी हिस्सों में 100 मिलियन डॉलर के निर्यात की रिपोर्टें थीं।
अफगानिस्तान ने पाकिस्तानी फार्मास्यूटिकल्स को क्यों छोड़ा?
अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति का इसमें अहम रोल रहा। यह राष्ट्र पहले बुनियादी मेडिकल आपूर्ति के लिए पाकिस्तान पर निर्भर रहा। नवंबर 2025 से पहले, पाकिस्तान अफगानिस्तान का प्रमुख दवा आपूर्तिकर्ता था। ऐसा इसलिए क्योंकि अफगानिस्तान में फार्मास्यूटिकल्स का घरेलू उत्पादन बहुत कम है, और यह अपनी 85-96 फीसदी दवाएं आयात करता है। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के माध्यम से यूएन कॉमट्रेड डेटा के अनुसार, पाकिस्तान ने 2024 में अफगानिस्तान को 186.69 मिलियन डॉलर मूल्य के फार्मास्यूटिकल्स का निर्यात किया।
रिपोर्ट्स से समझें बाजार का हाल
बिजनेस रिकॉर्डर ने 2023 के निर्यात का अनुमान 112.8 मिलियन डॉलर लगाया था। तालिबान के प्रशासनिक मामलों के महानिदेशक नुरुल्ला नूरी के अनुसार, नवंबर 2025 से पहले अफगानिस्तान में इस्तेमाल होने वाली 70 फीसदी से अधिक दवाएं पाकिस्तान से आती थीं। यह निर्भरता, जो दशकों पुरानी थी। इस भारी निर्भरता के बावजूद, बार-बार सीमा पर पाकिस्तान से झड़प के बाद अफगानिस्तान के तालिबान नेतृत्व ने पाकिस्तानी दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। इसके कारण देश में दवाओं की गंभीर कमी हो गई। ऐसे में दवा विक्रेता दवाओं को महंगी कीमत में बेचने लगे। इसी के बाद भारतीय दवाओं की मजबूत एंट्री अफगानिस्तान में हुई।
दवाओं के लिए भारत ने अफगानिस्तान ऐसे की मदद
नवंबर 2025 में, जब अफगानिस्तान दवा की कमी के प्रभाव को महसूस करना शुरू कर रहा था, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अहम ऐलान किया। उन्होंने तुरंत ही काबुल के लिए 73 टन जीवन रक्षक चिकित्सा आपूर्ति की एक आपातकालीन खेप हवाई मार्ग से भेजने की घोषणा की। यह पहली बार नहीं था जब भारत ने अफगानिस्तान को मेडिकल आपूर्ति भेजी थी। पिछले साल अप्रैल में, भारत ने रेबीज और हेपेटाइटिस-बी जैसी बीमारियों के लिए 4.8 टन टीके, जीवन रक्षक उपकरणों से लैस छह एम्बुलेंस, साथ ही एक उन्नत 128-स्लाइस सीटी स्कैनर भी भेजा था। इससे पहले 2022 में, अफगानिस्तान को तबाह करने वाले भूकंप के बाद, भारत ने आधा मिलियन कोविड टीके सहित 13 टन चिकित्सा आपूर्ति भेजी थी।
यूं ही नहीं भारत का बढ़ा अफगानिस्तान में दबदबा
आपातकालीन दवा शिपमेंट ही एकमात्र सहायता नहीं है जो भारत ने अफगानिस्तान को दी है। पिछले चार साल में 327 टन मेडिकल फेसिलिटी आपूर्ति प्रदान करने के अलावा, भारत ने अलग-अलग प्रांतों में पांच मातृत्व और स्वास्थ्य क्लीनिक बनाने, और काबुल में 30-बिस्तरों वाला एक अस्पताल बनाने का भी वादा किया था। भारत काबुल में ऑन्कोलॉजी सेंटर, ट्रॉमा सेंटर, डायग्नोस्टिक सेंटर और थैलेसीमिया सेंटर जैसी प्रमुख सुविधाओं के निर्माण का भी फैसला लिया है।
भारतीय फार्मा कंपनियों की मजबूत पकड़
भारतीय फार्मा दिग्गज सिर्फ काबुल को दवाएं नहीं बेच रहे हैं। नवंबर 2025 में एक ऐतिहासिक सौदा सामने आया, जब भारतीय फार्मा दिग्गज जाइडस लाइफसाइंसेज ने दुबई में अफगानिस्तान के रोफिस इंटरनेशनल ग्रुप के साथ 100 मिलियन डॉलर के MoU पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता, जो शुरू में निर्यात पर ध्यान केंद्रित करेगा, बाद में प्रौद्योगिकी ट्रांसफर, अफगानिस्तान में एक जाइडस प्रतिनिधि कार्यालय, और आयात निर्भरता को कम करने के लिए स्थानीय विनिर्माण सुविधाओं की स्थापना के साथ आगे बढ़ेगा।














