अमेरिकी फाइलों से पता चलता है कि निक्सन ने अपनी गवाही में बीजिंग को भरोसे देने का लॉजिक समझाया था। उन्होंने कहा था, ‘रूस खुलकर भारत को सपोर्ट कर रहा था। दूसरी ओर पाकिस्तान को मदद नहीं मिल रही था क्योंकि हथियारों की शिपमेंट पर रोक थी। हमने पाकिस्तान को मोरल सपोर्ट दिया और चीनियों से सीक्रेटली संपर्क साधा। हमने बीजिंग की सत्ता को भरोसा दिया कि चीन के भारतीयों से लड़ने के फैसला का हम सपोर्ट करेंगे।’
गवाही को सील क्यों किया गया
रिचर्ड निक्सन ने इस गवाही में कहा था कि चीन से संपर्क करने और भारत पर हमले के लिए उकसाने का फैसला उनका अपना था। इसके लिए उनको उनके किसी मंत्री ने नहीं कहा था। इस सात पेज के डॉक्यूमेंट को बहुत संवेदनशील माना गया था। इसे प्रॉसिक्यूशन टीम और ग्रैंड जूरी के लोगों तक से दूर रखा गया और सील कर दिया गया।
निक्सन की गवाही कोल्ड वॉर के समय की अमेरिकी सोच को सामने लाती है। अमेरिका दुनिया में ऐसी चीजें करने की कोशिश में था, जिसके गंभीर डिप्लोमैटिक और मिलिट्री नतीजे हो सकते थे। अमेरिका के इशारे पर अगर चीन ने भारत के खिलाफ तब मिलिट्री कार्रवाई कर दी होती तो इसके पूरे क्षेत्र और दुनिया के बड़े हिस्से के लिए बुरे नतीजे होते।
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध
भारत की आजादी के बाद अलग देश बना पाकिस्तान दो हिस्सों में था। यह पश्चिमी पाकिस्तान (मौजूदा पाकिस्तान) और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) था। इसके पूर्वी हिस्से में जल्दी ही आजादी की मांग शुरू हो गई। इसे कुचलने के लिए पाकिस्तानी आर्मी ने 60 के दशक के आखिर में बंगालियों पर भारी अत्याचार शुरू कर दिए। इससे भारत के पड़ोस में भी अस्थिरता फैलने लगी।
भारत ने बांग्लादेश में हलचल का असर देखते हुए इसमें दखल का फैसला लिया। भारत की उस समय की इंदिरा गांधी की सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ मिलिट्री एक्शन किया और 13 दिन में जंग जीतकर अलग देश बांग्लादेश बना दिया। पाकिस्तान तब अमेरिका का फेवरेट था तो भारत के साथ रूस मजबूती से खड़ा था। ऐसे में अमेरिका सिर्फ भारत पर गुस्सा निकालकर रह गया था।













