UN के 31 और गैर-UN के 35 संस्थानों पर असर पड़ेगा
अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय वॉइट हाउस के एक बयान के मुताबिक, अमेरिका का यह फैसला संयुक्त राष्ट्र (UN) के 31 और गैर संयुक्त राष्ट्र के 35 निकायों पर असर पड़ेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने कहा है कि ये संस्थान अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक वृद्धि या संप्रभुता का लंबे समय तक समर्थन नहीं करते हैं। कुछ मामलों में ये अमेरिकी प्राथमिकताओं के खिलाफ भी हैं।
क्या है ISA, जिससे अमेरिका ने किया किनारा
इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) एक वैश्चिक संगठन है, जिसका गठन भारत और फ्रांस ने मिलकर 2015 में किया था। इसका मकसद है कि सौर ऊर्जा को बढावा देना, सोलर पॉवर के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाना है, ताकि अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया सके। इसका एक मकसद जिन देशों में सूरज की रोशनी पर्याप्त मिलती है, उनमें सतत विकास को बढ़ावा दिया जा सके। इसका हेडक्वॉर्टर भारत में ही है।
किस तरह से काम करता है ISA
ISA एक ऐसे प्लेटफॉर्म की तरह काम करता है, जो सहयोग, निवेश, क्षमता बढ़ाने और इनोवेशन को बढ़ावा देता है, ताकि इससे ऐसा ग्लोबल सोलर मार्केट बन सके, जिससे कोयला-पेट्रोल आधारित फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता घटाई जा सके और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटा जा सके। सोलर एनर्जी के मामले में 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश का लक्ष्य रखा गया है। यह पहला ऐसा अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका हेडक्वॉर्टर भारत में है।
COP21-पेरिस से इतर बना था यह संगठन
ISA का गठन पेरिस में 2015 में COP21 सम्मेलन से इतर हुआ था। 2020 में इसके ढांचे में सुधार किया गया था, जिसमें कहा गया था कि इसके सदस्य यूएन के सभी सदस्य हो सकते हैं। मौजूदा वक्त में 100 से ज्यादा देश इसके हस्ताक्षरकर्ता देश हैं, जबकि 90 से ज्यादा देश इसके पूर्णकालिक सदस्य हैं।
IPCC क्लाइमेट चेंज से भी अमेरिका का किनारा
अमेरिका को न तो धरती की परवाह है और न ही पर्यावरण की। ट्रंप की नीतियों को लेकर एक्सपर्ट यह दावा करते हैं कि मौजूदा अमेरिकी प्रशासन का न तो अक्षय ऊर्जा और न ही क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दों पर फोकस है। अमेरिका इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) से भी किनारा करने वाला है। इसके अलावा, अमेरिका International Renewable Energy Agency, International Union for Conservation of Nature और International Energy Forum से भी अलग होगा। इसके अलावा, वह Global Counterterrorism Forum और Partnership for Atlantic Cooperation से भी अलग होने जा रहा है।
BRICS से भी दूर-दूर है अमेरिका
भारत को 1 जनवरी, 2026 से BRICS की अध्यक्षता मिल गई है। हाल के दिनों में अमेरिका ब्रिक्स को लेकर इच्छुक नहीं रहा है। खुद राष्ट्रपति ट्रंप ब्रिक्स को बेकार बता चुके हैं। दरअसल, ब्रिक्स के संस्थापक देशों ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के गठजोड़ को अमेरिका अपने हितों को नुकसान पहुंचाने वाला मानता आया है।














