कानूनी गारंटी पर खतरा
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार मनरेगा का नाम और ढांचा बदलकर उसकी कानूनी गारंटी को कमजोर करना चाहती है। पार्टी का कहना है कि मनरेगा सिर्फ एक रोजगार योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण गरीबों, खासतौर पर अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए जीवन रेखा रही है। VB-G RAM G जैसे नए ढांचे में रोजगार की कानूनी गारंटी, मजदूरी भुगतान की समयबद्धता और जरूरतों के अनुरूप काम देने की प्रतिबद्धता खत्म होने का खतरा है।
इसे राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए कांग्रेस ने पंचायत से संसद तक डेढ़ महीने का व्यापक कार्यक्रम तैयार किया है। इसके तहत कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के पत्र व्यक्तिगत रूप से ग्राम प्रधानों, पूर्व ग्राम प्रधानों, रोजगार सेवकों और मनरेगा मजदूरों तक पहुंचाए जाएंगे।
हाल के वर्षों में कांग्रेस ने वोट चोरी, SIR जैसे मुद्दों पर देशव्यापी अभियान चलाने की कोशिश की। लेकिन बिहार विधानसभा चुनावों में हार के बाद पार्टी के भीतर भावना बनी कि ऐसे मुद्दों का जमीनी असर सीमित रहा। इसलिए उसे एक ऐसे विषय की तलाश थी, जो सीधे जनता की रोजी-रोटी से जुड़ा हो। मनरेगा इस कसौटी पर खरा उतरता है।
इतिहास भी कांग्रेस के पक्ष में है
माना जाता है कि 2009 में केंद्र की सत्ता में उसकी वापसी के पीछे मनरेगा की निर्णायक भूमिका थी। अब पार्टी उसी सामाजिक आधार को सक्रिय करना चाहती है। खास तौर पर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां कांग्रेस लंबे समय से कमजोर रही है, मनरेगा के जरिए नए सिरे से राजनीतिक जमीन तैयार करने की उम्मीद की जा रही है।
कांग्रेस सरकार पर दबाव बनाना चाहती है कि वह योजना की मूल भावना से छेड़छाड़ न करे। पार्टी नेताओं का कहना है कि अगर इस मुद्दे पर विभिन्न वर्गों को एकजुट किया गया तो यह आंदोलन बड़ा रूप ले सकता है।
अवसर ही नहीं, परीक्षा भी
सवाल है कि क्या यह रणनीति उतनी कारगर साबित होगी जितनी कांग्रेस उम्मीद कर रही है। आज के राजनीतिक हालात 2009 से काफी अलग हैं। केंद्र सरकार विकसित भारत के नैरेटिव के साथ योजनाओं को नए नाम और ढांचे में पेश कर रही है जिसे एक बड़ा वर्ग सकारात्मक रूप में भी देखता है। ऐसे में कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि VB-G RAM G वास्तव में मनरेगा को कमजोर करता है न कि उसे और प्रभावी बनाता है।
कुल मिलाकर, मनरेगा बनाम VB-G RAM G कानून का मुद्दा कांग्रेस के लिए एक अवसर भी है और परीक्षा भी। अगर वह सचमुच मजदूरों के बीच जाकर उनके अनुभवों, समस्याओं और आशंकाओं को आंदोलन का केंद्र बनाती है तो यह अभियान उसे ग्रामीण भारत में फिर से प्रासंगिक बना सकता है।













