इसके अलावा तुर्की के राष्ट्रपति मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी से मिलने के लिए मिस्र गए, जहां वे ‘मिस्र-तुर्की उच्च-स्तरीय रणनीतिक सहयोग परिषद’ और एक तुर्की-मिस्र बिजनेस फोरम में हिस्सा लेंगे। काहिरा को उम्मीद है कि सालों की आर्थिक सुस्ती के बाद 2026 में तुर्की से 15 अरब डॉलर का निवेश आएगा। इसके अलावा मिस्र और तुर्की के बीच एक फ्रेमवर्क रक्षा उद्योग समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गये हैं, जो इन दोनों देशों के बीच संभावित गठबंधन का एक और संकेत है।
तुर्की का सऊदी अरब और मिस्र से झगड़ा क्यों हुआ?
सऊदी अरब और तुर्की के बीच कई वर्षों तक काफी तनावपूर्ण संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच का ये तनाव उनके बीच के कारोबार और राजनयिक संबंधों में भी देखने को मिले हैं, लेकिन अब लग रहा है कि दोनों देश, बदलते जियो-पॉलिटिकल हालातों को देखते हुए अपने संबंध को बदल रहे हैं। तुर्की का सऊदी और मिस्र के बीच तनाव तब शुरू हुआ था, जब एर्दोगन की सरकार ने अरब स्प्रिंक का समर्थन कर दिया था। अरब स्प्रिंग को मिडिल ईस्ट के देश अपनी सत्ता के लिए बहुत बड़ा खतरा समझते थे। मिस्र में जब 2013 में तख्तापलट की कोशिशें शुरू हुईं और इस्लामिक कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई, तो मुस्लिम ब्रदरहुड के कई नेता भागकर तुर्की चले गये।
सऊदी अरब भी इससे काफी गुस्साया हुआ था और वो एक अनौपचारिक क्रांति विरोधी गुट का मुखिया बन गया, जिसमें UAE, बहरीन और मिस्र शामिल थे। इन देशों ने 2017 में कतर पर नाकेबंदी लगा दी, क्योंकि वो लगातार मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन कर रहा था। वहीं, सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के बाद संबंध काफी खराब हो गये। जमाल खशोगी की हत्या, तुर्की में सऊदी अरब के दूतावास में की गई थी। तुर्की ने अपनी जांच में मोहम्मद सलमान को हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया।
इसके अलावा, सऊदी और तुर्की के बीच इस्लामिक देशों का मुखिया बनने की रेस में वर्षों तक लगी रही। सऊदी के पास दो पवित्र मस्जिद हैं तो तुर्की के पास करीब 9 करोड़ की आबादी और शक्तिशाली सेना है। तुर्की खुद को इस्लामिक दुनिया के खलीफा के तौर पर पेश कर रहा है। दोनों के शासन मॉडल में भी अंतर है। तुर्की में लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जबकि सऊदी में राजशाही है। वहीं, मिस्र, जिसने पिछले कुछ सालों में अपनी शक्ति काफी खो दी है, वो भी तुर्की से शक्ति के मामले में काफी पीछे है।
तुर्की, सऊदी और मिस्र में कैसे सुधर रहे संबंध?
डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद दुनिया में तेजी से हालात बदल रहे हैं। लेकिन मिडिल ईस्ट की स्थिति में कुछ साल पहले से ही परिवर्तन दिखने शुरू हो गये थे। एर्दोगन ने 2022 में और फिर 2023 में जेद्दा का दौरा किया, जो 2017 के बाद पहली यात्राएं थीं, जब दोनों देशों के बीच संबंध खराब हो गए थे। इसके बाद 2022 में रमजान के दौरान क्राउन प्रिंस मोहम्मद ने तुर्की का दौरा किया था, जहां दोनों नेताओं ने संबंधों और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई थी। हालांकि इस दौरान प्रिंस सलमान और एर्दोगन के बीच एक दूसरे के मामलों में दखल नहीं देने की सहमति जरूर बनी थी, लेकिन मतभेद खत्म नहीं हुए।
लेकिन तुर्की ने अरब देशों के बीच विश्वास बनाने के लिए मुस्लिम ब्रदरहुड के नेताओं के सख्ती दिखानी शुरू की। एर्दोगन ने 2024 में काहिरा में राष्ट्रपति सीसी से भी मुलाकात की, जो 2012 के बाद मिस्र की पहली यात्रा थी, जहां दोनों देशों ने “संबंधों में एक नए चरण” पर सहमति जताई और दोनों संघर्षरत अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा देने के लिए “कुछ ही सालों में” सालाना व्यापार को 15 अरब डॉलर तक बढ़ाने का वादा किया।
लेकिन मौदूदा हालात तब बदले हैं जब सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच संबंध खराब हो गये। इसके बाद सऊदी ने पाकिस्तान से रक्षा सौदा कर लिया और तुर्की से संबंध सामान्य करने के लिए हाथ आगे बढ़ाए। रिपोर्ट्स ऐसी भी आईं कि तुर्की, सऊदी और पाकिस्तान के रक्षा गठबंधन में शामिल हो सकता है। ताकि UAE की चौतरफा घेराबंदी की जा सके।













