यह स्टडी ‘सिटिजन्स जेनेरिक वर्सेज ब्रांडेड ड्रग्स क्वालिटी प्रोजेक्ट’ नाम से केरल के एक नॉन-प्रॉफिट संगठन ‘मिशन फॉर एथिक्स एंड साइंस इन हेल्थकेयर’ ने की है। इस प्रोजेक्ट में दिल की बीमारी, डायबिटीज, लिवर की समस्या, इन्फेक्शन, दर्द, एसिडिटी, एलर्जी और थायराइड जैसी 22 आम बीमारियों की 131 दवाओं के सैंपल टेस्ट किए गए।
इस प्रोजेक्ट को ‘द लिवर डॉक्टर’ नाम से फेसम डॉ. साइरिएक एबी फिलिप्स ने लीड किया। उन्होंने बताया कि लोग सबूतों के बजाय डर और शक की वजह से सस्ती दवाओं को छोड़ देते हैं। इससे उनके इलाज पर बुरा असर पड़ता है और उनकी सेहत खराब हो सकती है।
कौन सी दवाओं पर हुए रिसर्च?
इस स्टडी में बड़ी कंपनियों की ब्रांडेड दवाएं, बड़ी फार्मा कंपनियों की ब्रांडेड जेनेरिक दवाएं, लोकल जेनेरिक दवाएं और ‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना’ के तहत सरकार की ओर से सप्लाई की जाने वाली दवाएं शामिल थीं। सभी सैंपल फार्मेसी से खरीदे गए थे।
पांच टेस्ट के बाद चौंकाने वाले नतीजे
टेस्टिंग एक ऐसी लैब में हुई जो ‘नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज’ (NABL) और US फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) से मान्यता प्राप्त है। पांच तरह के टेस्ट किए गए: दवा की मात्रा, दवा का घुलना (Dissolution), एकरूपता (Uniformity), अशुद्धियां (Impurities) और बाहरी रूप (Physical Appearance)। सभी जेनेरिक दवाओं ने तय क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को पूरा किया और ब्रांडेड दवाओं के बराबर ही परफॉर्म किया।
कीमतों में भारी अंतर
सबसे खास बात कीमतों का अंतर था। एक गोली का औसत दाम ब्रांडेड दवाओं के लिए 11.17 रुपये था, जबकि जनऔषधि दवाओं के लिए यह सिर्फ 2.4 रुपये था। कई लोकल जेनेरिक दवाएं भी काफी सस्ती थीं। पैंटोप्राजोल, एटोरवास्टेटिन और रिफैक्सिमिन जैसी दवाओं के ब्रांडेड वर्जन सबसे सस्ती क्वालिटी-टेस्टेड दवाओं से 5 से 14 गुना तक महंगे थे। भारत में लोग अपने हेल्थकेयर खर्च का 62% से 69% दवाओं पर खर्च करते हैं। डॉक्टर बताते हैं कि महंगी दवाओं की वजह से लोग अक्सर दवाएं लेना भूल जाते हैं, समय पर नहीं लेते या इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं, खासकर पुरानी बीमारियों में।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
- बड़े डॉक्टर भी इस स्टडी के नतीजों से सहमत हैं। इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स के सीनियर कंसल्टेंट इंटरनल मेडिसिन, डॉ. सुरंजीत चटर्जी ने कहा कि कम कीमत वाली दवाएं, जिनमें जनऔषधि दवाएं भी शामिल हैं, इंडियन फार्माकोपिया के स्टैंडर्ड्स को पूरा करती हैं और उम्मीद के मुताबिक काम करती हैं। उन्होंने कहा कि वे ऐसे मरीजों को ये दवाएं लिखने में सहज हैं जो पैसों की तंगी झेल रहे हैं।
- हालांकि, उन्होंने यह भी सलाह दी कि इन दवाओं की नियमित निगरानी जरूरी है। उन्होंने कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी बताईं जैसे कि इन दवाओं की उपलब्धता में कभी-कभी कमी, डोज के सीमित विकल्प, पैकेजिंग और मरीजों का इन पर भरोसा कम होना। उन्होंने कहा कि अगर ये दवाएं ज्यादा आसानी से उपलब्ध हों और हर बैच की क्वालिटी एक जैसी रहे, तो लोग इन्हें ज्यादा इस्तेमाल करेंगे।
- एशियन हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट एंडोक्रिनोलॉजी, डॉ. संदीप खरब ने कहा कि ये नतीजे वही बताते हैं जो डॉक्टर रोज देखते हैं। उन्होंने कहा कि मेटफॉर्मिन, एम्लोडिपिन और लेवोथायरोक्सिन जैसी दवाओं के सस्ते वर्जन पर मरीज उतनी ही अच्छी तरह ठीक होते हैं जितनी महंगी ब्रांडेड दवाओं पर। उन्होंने यह भी जोड़ा कि मान्यता प्राप्त लैब में हुई टेस्टिंग से क्वालिटी की ज्यादातर चिंताएं दूर हो जाती हैं और लंबे समय तक इलाज जारी रखने के लिए दवा का सस्ता होना बहुत जरूरी है।














