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  • मुआवजा सजा के बराबर या उसके विकल्प के रूप में नहीं माना जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

    नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि किसी अपराध के दोषी को पीड़ित को आर्थिक मुआवजा देने पर हल्की सजा देकर नहीं छोड़ा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मुआवजे को सजा के बराबर या उसका विकल्प नहीं माना जा सकता। जस्टिस


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    By Azad Hind Desk फरवरी 18, 2026
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    नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि किसी अपराध के दोषी को पीड़ित को आर्थिक मुआवजा देने पर हल्की सजा देकर नहीं छोड़ा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मुआवजे को सजा के बराबर या उसका विकल्प नहीं माना जा सकता। जस्टिस राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई की पीठ ने मंगलवार कहा कि अपर्याप्त सजा सुनाते समय आरोपी के प्रति अनुचित सहानुभूति समाज को नुकसान पहुंचाएगी और न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को कम करेगी। पीठ ने मुआवजे को सजा का विकल्प मानने की विभिन्न उच्च न्यायालयों की ‘गलत समझ’ पर चिंता व्यक्त की।

    जस्टिस बिश्नोई ने कहा कि पीड़ित को दिया जाने वाला मुआवजा सजा के बराबर या उसके विकल्प के रूप में नहीं माना जा सकता है। सजा दंडात्मक होती है और इसका उद्देश्य अपराधियों को यह सामाजिक संदेश देना है कि समाज के नैतिक मानदंडों का उल्लंघन करने पर गंभीर परिणाम भुगतने होंगे, जिन्हें केवल पैसे से नहीं खरीदा जा सकता।

    पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें हत्या के प्रयास के मामले में तीन साल की जेल की सजा को दो महीने की सजा में बदल दिया गया था, क्योंकि दोषी ठहराए गए दोनों व्यक्तियों ने पीड़ित को 50-50 हजार रुपये देने पर सहमति जताई थी। पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले में आपराधिक कानून के सिद्धांत को पूरी तरह नजरअंदाज किया।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सजा देते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सजा न तो बहुत कठोर हो और न ही इतनी हल्की हो कि उसका डर ही कम हो जाए। सजा का उद्देश्य बदला लेना नहीं है; बल्कि समाज को जो नुकसान हुआ है उसको सही करना और व्यवस्था को सही रास्ते पर लाना है।

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