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  • मुश्किल समय में हनुमान चालीसा का पाठ करते थे मार्क टली, वो परदेशी जिसने भारत को ओढ़ लिया

    रामदत्त त्रिपाठी, नई दिल्ली: मार्क टली ब्रिटिश नागरिक थे, लेकिन भारत के लिए विदेशी नहीं थे। उनका जन्म कलकत्ता में हुआ था, 24 अक्टूबर 1935 को टालीगंज में। पिता चाय के बागान में अफसर थे। 9 साल तक उनकी परवरिश भारत में ही हुई। यह बात अलग है कि परवरिश वैसी ही ही हुई, जैसी


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    By Azad Hind Desk जनवरी 26, 2026
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    रामदत्त त्रिपाठी, नई दिल्ली: मार्क टली ब्रिटिश नागरिक थे, लेकिन भारत के लिए विदेशी नहीं थे। उनका जन्म कलकत्ता में हुआ था, 24 अक्टूबर 1935 को टालीगंज में। पिता चाय के बागान में अफसर थे। 9 साल तक उनकी परवरिश भारत में ही हुई। यह बात अलग है कि परवरिश वैसी ही ही हुई, जैसी अंग्रेज परिवारों में होती है। उनका भारतीय बच्चों से ज्यादा मिलना-जुलना नहीं था।

    मार्क टली बनना चाहते थे पादरी

    पढ़ने के लिए ब्रिटेन भेजा गया। कैंब्रिज में थियोलॉजी (Theology) में पढ़ाई शुरू की। शुरू में उनका रुझान धर्म की ओर था। चर्च में पादरी बनना चाहते थे, लेकिन दो साल बाद लगा कि यह काम मुश्किल है, तो विचार छोड़ दिया। उसी दौरान बीबीसी के पर्सोनेल डिपार्टमेंट में एक वैकेंसी आई थी, थी, वह जुड़ गए। फिर 1964-65 में भारत में वैकेंसी आई तो यहां चले आए। हालांकि इससे पहले लंदन में भी हिंदी-ऊर्दू सर्विस में काम कर चुके थे। भारत का वह कालखंड उथल-पुथल वाला था। मार्क टली ने भारत-पाकिस्तान युद्ध, 71 की जंग कवर की।

    जब मार्क टली की गिरफ्तारी की नौबत आई

    इमरजेंसी के दौरान टली को दिक्कत आई थी। तब बीबीसी ने भारत सरकार की बात मानने से इनकार कर दिया था। वहीं, सरकार में कुछ लोगों को लगता था कि टली निगेटिव रिपोर्टिंग करते हैं। उनको गिरफ्तार करने की बात भी चली थी। हालांकि फिर उनसे भारत छोड़ने को कहा गया और वह चले गए। उनकी वापसी हुई इमरजेंसी खत्म होने के बाद और फिर से अपने काम में जुट गए। ऑपरेशन ब्लू स्टार को करीब से कवर किया। तब उनके साथी थे सतीश जैकब। ऑपरेशन शुरू होने के पहले मार्क टली स्वर्ण मंदिर के अंदर भी गए थे। उन्होंने तब ऐसी खबरें निकालीं, जिसकी भनक इंटेलिजेंस को भी नहीं थी।

    जितने संवेदनशील, उतने ही आध्यात्मिक

    मार्क टली बेहद संवेदनशील थे और उतने ही आध्यात्मिक। उन्होंने 1978 का प्रयागराज कुंभ कवर किया और फिर अपनी किताब ‘No full Stops in India’ में इस पर लिखा भी। लेकिन, लिखने के बाद उन्होंने वह चैप्टर मुझे भेज दिया कि कहीं कोई ऐसी बात न हो, जो भावनाओं को ठेस पहुंचाए। उनमें सांस्कृतिक संवेदनशीलता थी। यह भारत का असर ही था उनपर कि जब भी वह मुश्किल महसूस करते तो हनुमान चालीसा का पाठ करने लगते।

    ठेले पर खाकर की रिपोर्टिंग

    गजब की सादगी थी उनमें। कहीं भी ऐडजस्ट हो जाते। उनके इसी पहलू से जुड़ा एक किस्सा 1991 का है। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने बलिया के एक गांव में अपनी पार्टी का अधिवेशन रखा था। वहां कोई सुविधा नहीं थी, टेंट लगाकर काम हो रहा था। बाकी पत्रकारों ने वहां रुकने से मना कर दिया, पर टली वहीं रहे। ठेले पर खाकर रिपोर्टिंग की।

    अयोध्या से ऐतिहासिक कवरेज

    मार्क टली का करियर बाबरी ढांचा ध्वंस का जिक्र किए बिना अधूरा है। 6 दिसंबर 1992 को मैं भी उनके साथ वही था। सामने बाबरी मस्जिद दिख रही थी। बाई तरफ भाषण स्थल था और नीचे कारसेवको का हुजूम। करीब 12 बजे शोर हुआ और भीड़ ढांचे पर चढ़ गई। उस समय किसी गलतफहमी की वजह से कारसेवक बीबीसी और मार्क टली से नाराज थे, तो हम लोग मुख्य रास्तों से बचते हुए, गांव-गांव होते फैजाबाद पहुंचे और वहां के तारघर से दिल्ली खबर पहुंचाई। मार्क टली इसके बाद वापस अयोध्या पहुंच गए, लेकिन इस बार कारसेवको ने उन्हें पकड़ लिया। एक महंत और एडीएम ने बीच-बचाव किया किसी तरह से। उस दिन कई अंग्रेज पिटे, क्योंकि कारसेवको को लगता था कि हर गोरा मार्क टली है।

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