राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( RSS ) के सरसंघचालक मोहन भागवत देशभर के दौरे पर हैं। इस दौरान उनके भाषण और सवाल-जवाब चर्चा में हैं। ये यात्राएं संघ के शताब्दी वर्ष के तहत पहले से तय थीं। इनमें संघ से जुड़े सवालों के जवाब खुद भागवत दे रहे हैं। पहले ऐसा नहीं हुआ, जब इतने विस्तार से संघ के विभिन्न पहलुओं के बारे में खुद संघ प्रमुख ने बताया हो। इसमें दो बातें खास महत्वपूर्ण लगती हैं-सरसंघचालक का ब्राह्मण होना और मुस्लिमों के साथ RSS का रिश्ता।
जाति अहम नहीं
अक्सर यह सवाल उठता है कि संघ प्रमुख ब्राह्मण ही क्यों होते हैं? जैसा भागवत ने बताया, संघ की शुरुआत ऐसे समाज में हुई जहां ब्राह्मणों की संख्या अधिक थी, इसलिए शुरुआती कार्यकर्ता और संस्थापक भी अधिकतर ब्राह्मण थे। लेकिन, रिसर्च करने वाले और संघ को करीब से जानने वाले बताते हैं कि यहां पद जाति के आधार पर नहीं, काम और समर्पण के आधार पर मिलता है। संघ में कौन किस जाति का है, यह व्यवहार में दिखाई नहीं देता। नेतृत्व में अलग-अलग जातियों के लोग हैं। सरसंघचालक का चयन आपसी विश्वास और सहमति से होता है, जाति वहां मुद्दा नहीं होती।
सद्भाव जरूरी
सवाल यह भी उठता है कि संघ जातीय भेदभाव और संघर्ष खत्म करने के लिए क्या रास्ता बताता है? भागवत के अनुसार, तनाव और विषमता तब पैदा होती है, जब हम खुद को एक देश और एक मातृभूमि की संतान के रूप में नहीं देखते। यहीं पर हिंदू होने का भाव महत्वपूर्ण है। वह कहते हैं कि ऊंच-नीच से ऊपर उठकर आपसी सद्भाव बढ़ाना जरूरी है। जो पीछे रह गए हैं, उन्हें सहारा देकर आगे लाना चाहिए। समस्या है कि जाति विहीन समाज की बात करते हुए भी व्यवहार में जाति भेद बढ़ाने वाले बहुत हैं। इसका समाधान किसी एक सरकार या संगठन से नहीं होगा, समाज के हर व्यक्ति को प्रयास करना होगा।
धर्म परिवर्तन
कुछ लोग मुस्लिम समाज और उनकी ‘घर वापसी’ के मुद्दे पर भी सवाल उठाते हैं। संघ प्रमुख का कहना है कि भारत के सभी मुस्लिमों के पूर्वज हिंदू थे। वे बाहर से नहीं आए, उन्होंने अपना धर्म बदला। जहां तक उनकी हिंदू धर्म में वापसी का सवाल है, तो किसी को लालच, दबाव या छल से धर्म बदलने के लिए मजबूर करना गलत है। लेकिन, अगर कोई अपनी इच्छा से आना चाहे, तो उसे रोका नहीं जाना चाहिए। ऐसे लोगों की जिम्मेदारी फिर हिंदू समाज को लेनी चाहिए। इस विषय पर बोलने पर अक्सर तीखी प्रतिक्रिया होती है। कुछ मुस्लिम नेताओं, जैसे अरशद मदनी ने कड़ी आपत्ति जताई। हालांकि भागवत ने जबरन ‘घर वापसी’ की बात नहीं कही, उनका वक्तव्य केवल स्वेच्छा से लौटने वालों को लेकर था।
शाखा में मुस्लिम
यह सवाल भी बहुत उठता है कि क्या शाखा में मुसलमान आते हैं? जवाब यही है कि शाखा में आने वालों को जाति या मजहब से नहीं, केवल हिंदू के रूप में देखा जाता है। संघ की सोच के अनुसार, भारत में रहने वाले सभी लोग सांस्कृतिक रूप से हिंदू हैं, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद जैसे महापुरुषों ने भी यही बात कही थी।
हिंदू राष्ट्र
यह भी पूछा जाता है कि क्या संघ संविधान से सेकुलर शब्द हटाकर हिंदू राष्ट्र घोषित करना चाहता है और तिरंगे की जगह भगवा लहराना चाहता है? भागवत ने इसका जवाब यह दिया कि भारत हिंदू राष्ट्र है, इसे घोषित करने की जरूरत नहीं। समस्या वहां से हुई, जब भारत पर पश्चिमी राष्ट्रों की परिभाषा लादी गई। भारतीय चिंतन में राष्ट्र एक जीवन दर्शन है, जिसे लोगों ने जीवन शैली के रूप में अपनाया है। संघ ने कहा है कि देश में कभी किसी पंथ या मजहब की धार्मिक स्वतंत्रता खत्म नहीं होगी, क्योंकि यह भारत और हिंदुत्व के चरित्र के विपरीत है।
कोई दुश्मन नहीं
शताब्दी अभियान के दौरान आई बातों पर ध्यान दें तो कई गलतफहमियां दूर हो सकती हैं। साथ ही भारत राष्ट्र, राजनीति, जाति, समाज, सेकुलरिज्म, विकास, शिक्षा, संस्कृति और रोजगार जैसे मुद्दों पर एक व्यापक समझ बनती है। संघ की सोच है कि सेकुलरिज्म को धर्मनिरपेक्षता नहीं, सम्प्रदाय तटस्थता के रूप में समझना चाहिए। संघ के सतत विस्तार का उत्तर भागवत की इस पंक्ति में है कि हमारा कोई विरोधी नहीं, हमारे लिए दो ही श्रेणी हैं – एक जो हमारे साथ हैं और दूसरे, जो साथ आने वाले हैं। यह छोटा, लेकिन असाधारण आचरण सूत्र है। अगर यह मान लिया जाए कि जो आज साथ नहीं हैं, वे भी कल साथ होंगे, तो कोई विरोधी या दुश्मन नहीं रह जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और विचारक हैं)













