एक बेटे के लिए बाबा मतलब पिता हैं और पोते के लिए दादा। बनारस में बाबा सिर्फ एक हैं – काशी विश्वनाथ और संगम तट पर मेला ही बाबाओं का है। भाषा, संस्कृति, भूगोल – कुछ भी बदल लीजिए, पर बाबा शब्द के साथ जुड़ा आत्मीयता और सम्मान का भाव नहीं बदलता। भारत से लेकर मध्य एशियाई सभ्यताओं तक ‘बाबा’ मौजूद हैं – कहीं रिश्तों में, कहीं सूफी संतों में, कहीं भगवा में, कहीं शख्सियतों में। कोई भी इस पर कॉपीराइट हक जताने की स्थिति में नहीं, लेकिन उत्तराखंड के कोटद्वार में अब लड़ाई इसी बात की लग रही है।
संविधान और बाबा
बीते एक हफ्ते से सोशल मीडिया ‘ मोहम्मद दीपक ‘ के नाम से बने कंटेंट से अटा पड़ा है। राजनीति की तरह राय भी बंटी हुई है – कुछ समर्थन में और कुछ खिलाफ। विरोध करने वाले चुनौती दे रहे हैं, जबकि दीपक का कहना है कि उन्हें अपने अंजाम का डर नहीं और जरूरत पड़ने पर वह दोबारा ऐसा करेंगे। और उन्होंने किया क्या है… वह तब सामने खड़े हो गए, जब बजरंग दल से जुड़े कुछ लोग एक बुजुर्ग दुकानदार पर अपनी दुकान से ‘बाबा’ शब्द हटाने का दबाव डाल रहे थे। यह बस संयोग है कि मूल घटना 26 जनवरी की है, जिस दिन संविधान लागू हुआ और जिसने देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार और कानूनी संरक्षण दिया, जिसमें सम्मानजनक जीवन का भी अधिकार है। लेकिन, इस मामले में सारे कानून, सारे अधिकार ‘भावनाओं’ के सामने पस्त होते नजर आ रहे हैं। विरोध करने वालों के हिसाब से एक मुस्लिम दुकानदार ‘बाबा’ शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता, क्योंकि यह उसके धर्म का नहीं और इससे भावनाएं आहत होती हैं। किसी की भावनाएं आहत करना वाकई अपराध है, लेकिन समस्या है कि अब भावनाएं भी हैसियत के हिसाब से चलने लगी हैं।
सही-गलत का सवाल
लोगों की भावनाएं तब आहत नहीं होतीं, जब इसी उत्तराखंड में अंकिता भंडारी केस में VIP एंगल की जांच के लिए पूरे राज्य में विरोध-प्रदर्शन करना पड़ता है। भावनाओं को फर्क तब भी नहीं पड़ता, जब गंदे पानी की वजह से आम लोगों की मौत होती है और मंत्री कहते हैं ‘घंटा’। भावनाएं ‘शंकराचार्य विवाद’ से भी आहत होनी चाहिए थीं और डॉनल्ड ट्रंप के बार-बार भारत पर दबाव बनाने की कोशिशों से भी। मुश्किल है कि ये मामले भावनाओं के खेल से ज्यादा बड़े थे। कोटद्वार केस में पुलिस ने तीन केस दर्ज किए हैं। इनमें से एक दीपक और उनके दोस्त के खिलाफ भी है। दीपक को समझ नहीं आ रहा कि उन पर FIR क्यों हुई है, जैसे उन्हें यह नहीं समझ आ रहा कि उन्होंने गलत क्या किया है। उन्हें समर्थन मिल रहा है, लेकिन जिस तरह के विरोध-प्रदर्शन और गुस्से को वह झेल रहे हैं, उसके बाद यह सवाल रह जाएगा कि फिर कौन सही को सही कहने की हिम्मत करेगा।













