जर्मनी ने प्रोजेक्ट से पीछे खींचे हाथ
द प्रिंट ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि प्रोग्राम में भारत के शामिल होने की संभावना पर शुरुआती बातचीत पहले ही हो चुकी है। अब जर्मनी के पीछे हटने भारत के लिए संभावना बढ़ गई है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने पिछले सप्ताह कहा था कि प्रोग्राम उनके लिए काम का नहीं है। दरअसल, फ्रांस को एक ऐसे जेट की जरूरत है तो न्यूक्लियर हथियार ले जा सके। लेकिन जर्मनी को ऐसी जरूरत नहीं है, क्योंकि वह परमाणु हथियारों के खिलाफ है। यहां तक कि उसने अपने परमाणु पावर प्लांट भी बंद कर दिए हैं।
खतरे में यूरोप का कॉम्बैट एयर प्रोजेक्ट
जर्मनी के निकलने के बाद प्रोजेक्ट खतरे में पड़ गया है। इस प्रोजेक्ट में शामिल कंपनियों दसॉल्ट एविएशन (फ्रांस), एयरबस (जर्मनी/स्पेन) और इंद्रा सिस्टेमास (स्पेन) के बीच भी प्रोग्राम को लेकर बहस चल रही है। इस बहस से एक 2-फाइटर सॉल्यूशन का सुझाव सामने आया है। इसमें कहा गया है कि फ्रांस और जर्मनी/स्पेन एक साझा FCAS आर्किटेक्चर के तहत अलग-अलग फाइटर डिजाइन बना सकते हैं, ताकि पूरा प्रोग्राम बंद न हो जाए।
द गॉर्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, एयरबस के चीफ एग्जीक्यूटिव गिलौम फाउरी ने गुरुवार को एक संभावित रास्ता बताया। उन्होंने सुझाव दिया कि फ्रांस और जर्मनी दोनों अलग-अलग जेट बनाएं, लेकिन उन्हें शेयर्ड कॉम्बैट क्लाउड और ड्रोन सिस्टम के जरिए जोड़ें। उन्होंने कहा कि इस हाई-टेक क्षमता का पूरा भविष्य खतरे में नहीं पड़ना चाहिए।
प्रोग्राम में भारत की एंट्री?
द प्रिंट की रिपोर्ट में डिफेंस और सिक्योरिटी एस्टैबलिशमेंट के सूत्रों ने हवाले से कहा गया है कि भारत ने फ्रांस को साफ-साफ बता दिया है कि अगर जर्मनी के साथ बात नहीं बनती है तो वह FCAS प्रोजेक्ट में शामिल होने पर विचार करने करने को तैयार है। भारत पहले ही अपना पांचवी पीढ़ी का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट बना रहा है। FCAS में शामिल होने से भारत की छठी पीढ़ी के फाइटर की तकनीक तक पहुंचने में तेजी आ सकती है। भारत-फ्रांस पार्टरनशिप FCAS तक पहुंचेगी यह देखना अभी बाकी है लेकिन यह पता चलता है कि यूरोप के सबसे बड़े एयर कॉम्बैट प्रोजेक्ट पर नई दिल्ली करीब से नजर रखे हुए है।













