तेल का इस काले खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी रूस है। डार्क फ्लीट में अक्सर पुराने जहाजों का यूज किया जाता है। इनमें से ज्यादातर पश्चिमी देशों की कंपनियों के होते हैं। ये अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को चकमा देने के लिए कई तरह के अवैध तरीके अपनाते हैं। इनमें फर्जी झंडे लगाना, फर्जी लोकेशन भेजना, बार-बार नाम बदलना और जीपीएस सैटेलाइट से बचने के लिए ट्रांसपोंडर बंद करना शामिल है। इन जहाजों का ऑनरशिप स्ट्रक्चर इतना जटिल होता है कि उन्हें पकड़ पाना आसान नहीं होता है। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद ऐसे जहाजों की संख्या में बड़ी तेजी आई है। ये जहाज रूस के बाल्टिक और ब्लैक सी बंदरगाहों से तेल लेकर जाते हैं और इससे रूस को सालाना अरबों डॉलर की कमाई होती है।
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कितना बड़ा है फ्लीट?
Kpler के एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में शैडो फ्लीट में 3,300 से अधिक जहाज हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल के दिनों में सिंगापुर के आसपास इस तरह की जहाजों की बड़ी मूवमेंट देखी गई है। ये जहाज अक्सर प्रतिबंधित तेल और सैन्य साजोसामान ले जाते है। अमूमन ये रात के समय जहाजों के बीच कार्गो को ट्रांसफर करते हैं। अक्सर मलेशिया के तट पर इस तरह के एक्टिविटी को अंजाम दिया जाता है। इससे सेफ्टी और पर्यावरण को गंभीर खतरा हो सकता है। इनमें से अधिकांश कंपनियों का मालिकाना हक ऐसी शेल कंपनियों के पास होता है जो दुबई जैसे देशों से ऑपरेट करती हैं।
जानकारों का कहना है कि यह पता लगाना मुश्किल होता है कि इन जहाजों का मालिक कौन हैं और उनका बीमा कौन करता है। अक्सर वे बंकरिंग करते थे, जो जहाजों के बीच समुद्र में फ्यूल ट्रांसफर करने की प्रक्रिया है। इससे यह ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है कि वह जहाज वास्तव में कहां से आया है और वह तेल कहां से आया है। कभी-कभी, वे तेल मिलाते हैं, इसलिए आपके पास एक वैध जहाज होगा जो समुद्र में एक शैडो फ्लीट के साथ जहाज-से-जहाज ट्रांसफर करेगा और वे तेल मिला देंगे ताकि यह पता लगाना मुश्किल हो जाए कि वह तेल वास्तव में कहां से आया है।
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सेलर और बायर
रूस और ईरान ग्लोबल मार्केट में प्रतिबंधित कच्चे तेल के प्रमुख विक्रेता हैं जबकि खरीदारों में भारत और चीन सबसे ऊपर हैं। Kpler के अनुसार 2025 के अंतिम तीन महीनों में भारत और चीन ने शेडो फ्लीट से करीब 20 फीसदी कच्चा तेल खरीदा। S&P की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। यह तेल चीन तक एक अस्पष्ट प्रक्रिया के जरिए पहुंचता है। ईरानी कच्चे तेल ले जाने वाले जहाज दक्षिण पूर्व एशिया के तटीय इलाकों में दूसरे जहाजों में अपना माल शिफ्ट करते हैं। फिर ये जहाज चीनी बंदरगाहों की ओर बढ़ते हैं।
शैडो फ्लीट 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से चर्चा में आया। पश्चिमी देशों ने रूस के तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था। इन प्रतिबंधों से बचने के लिए रूस ने तेल टैंकरों का एक डार्क फ्लीट डेवलप किया। Kpler के अनुसार 2022 में इस बेडे़ में केवल 97 जहाज थे लेकिन 2025 के अंत तक यह बेड़ा 3,313 जहाजों तक पहुंच गया। पिछले साल इस डार्क फ्लीट ने करीब 100 बिलियन डॉलर का क्रूड ट्रांसपोर्ट किया जो ग्लोबल ऑयल फ्लो का 6-7% था। इतना ही नहीं पश्चिमी देशों का आरोप है कि रूस इनका यूज स्पाइंग यानी जासूसी के लिए भी कर रहा है। इनके जरिए समुद्र में अमेरिका और दूसरे देशों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।
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क्यों नहीं मिलता पता?
Kpler के अनुसार, नवंबर 2025 में शैडो फ्लीट द्वारा भेजे गए 299 मिलियन बैरल क्रूड में से 63 मिलियन बैरल रूस का था। दिलचस्प बात यह है कि प्रतिबंधित क्रूड के अन्य प्रमुख निर्यातक सऊदी अरब और अमेरिका हैं। Kpler के अनुसार, 2025 में, अवैध रूप से कच्चा तेल ले जाने के लिए 686 जहाजों और 196 फर्मों पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बावजूद शैडो फ्लीट न केवल बड़ा है बल्कि इसका परिचालन भी काफी मजबूत है। इसे एक ऐसा ईकोसिस्टम सपोर्ट करता है जिसे भेद पाना मुश्किल है।
भारत भी शैडो फ्लीट के जरिए क्रूड का एक प्रमुख आयातक है। एक अनुमान के मुताबिक साल 2024 में रूस से भारत आने वाले कच्चे तेल में से 9.5% शैडो फ्लीट के जरिए आया था। अप्रैल में अमेरिकी टैरिफ के बाद, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत ने रूसी कच्चे तेल के अपने आयात में उल्लेखनीय कमी की है। भारत के कच्चे तेल के आयात में रूस की हिस्सेदारी जुलाई 2024 में 45% के उच्च स्तर से घटकर दिसंबर 2025 में 32% रह गई।












