VM-4SG रिएक्टर का इस्तेमाल प्रोजेक्ट 667BDRM SSBNs के न्यूक्लियर पावर प्लांट में किया जाता है, जो डेल्टा पनडुब्बी का एक एडवांस्ड वेरिएंट है। इसे रूबिन सेंट्रल डिजाइन ब्यूरो ने डेवलप किया था और 1984 और 1992 के बीच सेवेरोडविंस्क के सेवमाश में बनाया गया था। पूरी तरह तैयार होने और टेस्टिंग के बाद इसे रूस के सात जहाजों में कमीशन किया गया था। ये रिएक्टर किसी जहाज को काफी लंबे समय तक समुद्र में रहने की क्षमता देते हैं, इसके अलावा इनसे जहाज का डिजाइन काफी कॉम्पैक्ट हो जाता है और इसे काफी हाई सिक्योरिटी के साथ तैयार किया जाता है।
Ursa Major जहाज डूबने के पीछे क्या सैन्य साजिश था?
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जहाज में हुआ विस्फोट इतना सटीक और घातक था, कि इसके लिए सुपरकैविटेटिंग टॉरपीडो के इस्तेमाल की आशंका जताई गई है। सीस्मिक डेटा 20–50 किलो TNT के बराबर विस्फोट की तरफ इशारा करता है। जहाज का रास्ता काफी संदेहास्पद था, सेंट पीटर्सबर्ग से व्लादिवोस्तोक के नाम पर निकला यह जहाज करीब 15,000 किलोमीटर के असामान्य रास्ते पर चल रहा था, जो उत्तर कोरिया के रेसॉं पोर्ट की तरफ जाने का इशारा करता है।
दो OK-700A न्यूक्लियर प्रोपल्शन यूनिट से चलने वाली ये डेल्टा सबमरीन पानी के अंदर 24 नॉट तक की स्पीड और 320 मीटर की ऑपरेशनल गहराई तक पहुंच सकती हैं। इस रिएक्टर के साथ इनकी रेंज अनलिमिटेड हो जाती है और 90 दिनों तक लगातार चल सकती हैं। हालांकि ला वेरदाद रिपोर्ट पर कुछ शक है। कई रूसी एनालिस्ट बताते हैं कि रिएक्टर अभी प्रोडक्शन में नहीं है। लेकिन ये पूरी घटना रहस्यमयी है और आधिकारिक तौर पर इस रिपोर्ट का ना तो खंडन किया गया है और ना ही पुष्टि की गई है।
रूसी न्यूक्लियर रिएक्टर का भारत से क्या है कनेक्शन?
भारत के लिए ये रिपोर्ट इसलिए काफी ज्यादा मायने रखता है, क्योंकि bmpd TC ने बताया है कि VM-4SG रिएक्टर, भारत के अरिहंत-क्लास SSBN पनडुब्बी के प्रोपल्शन यूनिट का हिस्सा है। चूंकि अरिहंत-क्लास पनडुब्बियां अभी भी बन रही हैं, इसलिए यह संभावना है कि VM-4SG रिएक्टर भी बन रहे होंगे। डिफेंस एनालिस्ट प्लेटफॉर्म bmpd के मुताबिक, VM-4SG रिएक्टर डिजाइन का इस्तेमाल भारत की अरिहंत क्लास SSBN पनडुब्बियों में लगे CLWR-B1 रिएक्टर में किया गया है। आधिकारिक तौर पर भारत इन्हें स्वदेशी बताता है, लेकिन यह भी माना जाता है कि इनके कई अहम हिस्से, खासतौर पर रिएक्टर वेसल (हुल) रूस में बने हैं। 2021 में L&T और NPCIL ने गुजरात के हजीरा में रिएक्टर हुल निर्माण सुविधा पूरी होने की घोषणा की थी, लेकिन अब तक किसी हुल के निर्माण की जानकारी सार्वजनिक तौर पर नहीं दी गई है। ऐसे में यह सवाल उठाता है कि क्या भारत अभी भी रणनीतिक रूप से रूस पर निर्भर है?
ला वेरदाद ने रूसी कार्गो शिप के डूबने के मामले में स्पेनिश समुद्री जांच (रिपोर्ट 8059/24-एस्कोरा) से मिली जानकारी का हवाला दिया गया है। भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड फाइटर जेट पायलट विजयेन्द्र के ठाकुर, जो सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट और मिलिट्री एनालिस्ट भी हैं, उन्होंने यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में लिखा है कि “तार्किक रूप से यह निष्कर्ष निकलता है कि जहाज को US/NATO की पनडुब्बी ने उत्तर कोरिया को SSN/SSBN क्षमता हासिल करने से रोकने के लिए डुबोया था।” हालांकि इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है।
क्या न्यूक्लियर पनडुब्बी डूबने का भारत पर असर?
इस पूरी घटना में राहत की बात यह है कि भारत की सभी Arihant-class पनडुब्बियां बन चुकी हैं, और चौथी पनडुब्बी का समुद्री ट्रायल चल रहा है, इसलिए अगर Ursa Major पर वाकई VM-4SG रिएक्टर थे भी, तो भारत की मौजूदा समुद्री परमाणु क्षमता पर तत्काल असर नहीं पड़ेगा। लेकिन सवाल ये उठते हैं कि उत्तर कोरिया परमाणु-संचालित पनडुब्बियां (SSN/SSBN क्षमताएं) विकसित करने की प्रक्रिया में है। जनवरी 2021 में, किम जोंग उन ने कोरिया की वर्कर्स पार्टी की 8वीं कांग्रेस में घोषणा की कि एक नई परमाणु-संचालित पनडुब्बी का डिजाइन, पांच साल की हथियार विकास योजना का हिस्सा है, जो अपने आखिरी चरण में है।













