वेनेजुएला पर कब्जा कर पैसा कमाएगा अमेरिका, चीन को करेगा तेल की सप्लाई, भारत पर क्या असर?
क्या है अमेरिका का प्लान?
अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम एक ऐसा कानून लाने की कोशिश कर रहे हैं जिसके तहत उन देशों पर भारी सेकेंडरी टैरिफ (दूसरे स्तर का आयात शुल्क) लगाया जाएगा जो रूस से तेल और गैस खरीद रहे हैं। अगर रूस 50 दिनों के अंदर यूक्रेन में युद्धविराम पर सहमत नहीं होता है तभी यह टैरिफ लगाया जाएगा। वहीं अगर सेकेंडरी टैरिफ का कानून पास हो जाता है तो उन देशों के लिए अमेरिका के साथ व्यापार करना बहुत महंगा हो जाएगा, जिन्हें रूस के युद्ध को आर्थिक मदद देने वाला माना जाता है।
भारत ने क्या उठाए कदम?
भारत ने अपनी तरफ से इस मामले में कुछ कदम उठाए हैं। अक्टूबर में अमेरिका ने रूसी तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज और कई सरकारी रिफाइनरी कंपनियों ने कहा था कि वे सेकेंडरी बैन से बचने के लिए रूस से तेल खरीदना बंद कर देंगे। रूस से तेल का आयात पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है। जीटीआरआई के मुताबिक तेल की मात्रा कम हुई है, लेकिन यह अभी भी आ रहा है। जीटीआरआई का कहना है कि इससे भारत एक ‘रणनीतिक ग्रे जोन’ (एक ऐसी स्थिति जहां सब कुछ स्पष्ट नहीं है) में फंस गया है।
अब क्या हैं भारत के पास विकल्प?
- जीटीआरआई का कहना है कि यह अनिश्चितता अब ज्यादा समय तक नहीं चलने वाली।
- अगर भारत रूस से तेल खरीदना बंद करना चाहता है तो उसे यह फैसला मजबूती से लेना होगा।
- अगर वह गैर-प्रतिबंधित रूसी सप्लायर्स से कच्चा तेल खरीदना जारी रखना चाहता है, तो उसे यह बात खुलकर बतानी चाहिए और आंकड़ों के साथ साबित करना चाहिए।
- वहीं अगर भारत प्रतिबंधित कंपनियों से भी तेल खरीदने को तैयार है तो उस रुख को भी साफ तौर पर बताना चाहिए।
नहीं बचा बीच का रास्ता
जीटीआरआई का कहना है कि अब बीच का रास्ता अपनाने का समय नहीं है। यह फैसला अमेरिका की मांगों की अनिश्चितता के कारण और भी मुश्किल हो गया है। यहां तक कि अगर रूस से तेल का आयात पूरी तरह से बंद कर दिया जाए, तो भी वाशिंगटन का दबाव कम नहीं हो सकता है। अमेरिका अन्य मुद्दों जैसे कृषि, डेयरी बाजार तक पहुंच, डिजिटल व्यापार या डेटा गवर्नेंस पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।













