टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक वैष्णव ने एक कार्यक्रम में कहा, “हमें अपनी सोच से भी गुलामी की मानसिकता को निकालना होगा। चाहे वह हमारे काम करने का तरीका हो या फिर हमारे पहनावे का तरीका, हमें हर जगह से इन पुरानी चीजों को हटाना होगा।” उन्होंने कहा, ‘आज मैं पहली घोषणा कर रहा हूं। हमारे जो बंद गले का काला सूट अंग्रेजों ने शुरू किया था, आज से यह रेलवे में फॉर्मल ड्रेस नहीं रहेगी।”
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पुरानी रीतियां बदलेंगी
यह सिर्फ रेलवे की वर्दी तक ही सीमित नहीं है। सरकार बड़े पैमाने पर ऐसी पुरानी रीतियों को पहचानने का काम कर रही है जो अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही हैं। इसमें विश्वविद्यालयों में होने वाले दीक्षांत समारोहों में पहने जाने वाले गाउन और टोपी भी शामिल हैं। साथ ही, अफसरों को औपचारिक मौकों पर जो बंद गले वाला कोट पहनना पड़ता है। अब उसे भी बदलने पर विचार हो रहा है। कुछ राज्यों में तो कलेक्टरों और मेयरों के साथ काम करने वाले कर्मचारियों को भी खास तरह की वर्दी पहनने का नियम है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी मंत्रियों और बड़े अफसरों को पुरानी प्रथाओं की पहचान करने और उनकी जगह भारतीय संस्कृति को दर्शाने वाले नए विकल्प सुझाने का निर्देश दिया है। दीक्षांत समारोहों में गाउन और टोपी पहनने का चलन धीरे-धीरे कम हो रहा है। लेकिन कुछ संस्थान अब भी इसका पालन कर रहे हैं। हालांकि, यह पहनावा भारत की गर्म और उमस भरी जलवायु के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। छात्रों और शिक्षकों ने भी इसका विरोध किया है।
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काला कोट और गाउन
अधिकारियों का कहना है कि ऐसी और भी कई प्रथाएं हैं जिनके बारे में आम लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन उन्हें भी बातचीत के जरिए पहचाना जाएगा। सूत्रों ने इस बात की भी संभावना जताई है कि वकीलों द्वारा पहने जाने वाले काले कोट और गाउन को भी बदलने के लिए कहा जा सकता है। यह प्रथा एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत चली आ रही है, जो अंग्रेजों के कानूनी सिस्टम से ली गई थी। उस समय यह पहनावा अधिकार, सम्मान और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक माना जाता था।












