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  • लेख: अपना अजेंडा चलाना चाहते हैं, राहुल यूं ही करते रहेंगे सरकार का विरोध

    देश में शीर्ष स्तर की राजनीति में जिस तरह का टकराव अभी दिख रहा है, वह चिंताजनक है। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न बोल पाएं, यह सामान्य स्थिति नहीं। सत्ता पक्ष का आरोप: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सदन में


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    By Azad Hind Desk फरवरी 11, 2026
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    देश में शीर्ष स्तर की राजनीति में जिस तरह का टकराव अभी दिख रहा है, वह चिंताजनक है। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न बोल पाएं, यह सामान्य स्थिति नहीं।

    सत्ता पक्ष का आरोप: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सदन में नहीं आने का अनुरोध किया। बिरला ने कहा कि सदन में कुछ अप्रत्याशित होने की आशंका थी। हालांकि, विपक्ष ने इसे गलत बताया है। सत्ता पक्ष के मुताबिक, कांग्रेस के 7- 8 महिला सांसदों का प्रधानमंत्री की सीट तक पहुंच कर घेरा बनाने की योजना थी। कांग्रेस ने कहा भी था कि अगर विपक्ष के नेता राहुल गांधी नहीं बोल पाए हैं तो प्रधानमंत्री को भी नहीं बोलने देंगे। प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में अवश्य भाषण दिया, लेकिन लोकसभा में कांग्रेस अपने रवैये पर कायम है।

    गरिमा बनी रही: विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री के भाषण में बाधा डालना, वॉकआउट करना, वेल में आकर हंगामा करना, संसद की कार्यवाही बाधित करना, ऐसे दृश्य देश ने देखे हैं। बोफोर्स भ्रष्टाचार के आरोप में 24 जून, 1989 को लोकसभा में विपक्ष के 110 में से 106 सांसदों ने त्यागपत्र दे दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के इस्तीफे की मांग को लेकर देश भर में अभियान चल रहे थे, लेकिन सदन की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया गया।

    पहले भी हुए हैं हंगामे: UPA सरकार के कार्यकाल में कॉमनवेल्थ, 2G मामलों पर हंगामा हुआ, कार्यवाही बाधित हुई। 2014 में दोनों सदनों में आंध्र प्रदेश के विभाजन का विधेयक पारित करना था तो भी समस्या आई थी। 14 फरवरी 2014 को लोकसभा में विधेयक पारित होने के दिन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के बोलते समय ऐसी स्थिति बनी कि लोकसभा टीवी का प्रसारण रोकना पड़ा। 20 फरवरी 2014 को राज्यसभा में विधेयक पारित करने के लिए सारे दरवाजे बंद कर मार्शल बुलाने पड़े थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बोलते समय विधेयक छीनो विधेयक फाड़ो का शोर मचा था और तृणमूल सांसद सुखेन्दु राय ने प्रधानमंत्री के बोलते समय कागजात फाड़ दिए। तब भी स्थिति अभी जैसी नहीं थी।

    राहुल का अपना अजेंडा: मोदी सरकार के सत्ता में आने के कुछ साल बाद, 2016-17 से हालात ज्यादा बिगड़े हैं। लोकसभा और राज्यसभा में अध्यक्ष और सभापति के आसन की ओर कागज फेंकना, आगे टेबल पर खड़े होकर मिमिक्री करना आदि संसदीय परंपरा के विपरीत व्यवहार दिखे हैं। वर्तमान लोकसभा में पहले दिन से विपक्ष के नेता राहुल गांधी का तय रहता है कि उन्हें क्या बोलना है, सदन में क्या विषय है, इससे उन्हें मतलब नहीं रहता।

    सेना के हाथ नहीं बांधे: राष्ट्रपति अभिभाषण को लेकर कई मुद्दों पर सरकार की आलोचना हो सकती है। लेकिन राहुल का विषय पूर्व थल सेना अध्यक्ष मनोज नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक थी, जिस पर अध्यक्ष ने नियमन दिया। इस बार एक पत्रिका में प्रकाशित आलेख को राहुल गांधी ने आधार बनाया है। हालांकि उसमें ऐसा कुछ नहीं है, जिससे लगे कि सरकार ने 2020 में गलवान घटना के बाद चीन के विरुद्ध कार्रवाई में सेना के हाथ बांधे। इसका भी ध्यान रखना चाहिए कि चीन के साथ 1962 के बाद केवल 1967 में सीमा पर गोली चली, उसके बाद कभी नहीं। गलवान संघर्ष में भी गोली नहीं चली।

    संविधान का मुद्दा: राहुल गांधी के पास लोकसभा में BJP के बाद सबसे ज्यादा सांसद हैं। इसलिए उनसे ऐसा व्यवहार अपेक्षित नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव में संविधान-आरक्षण खत्म करने का विपक्ष ने झूठा डर दिखाया, जिसका कुछ हद तक उसे फायदा भी हुआ। क्या दूसरे मुद्दों के साथ कांग्रेस आगे भी इसी रणनीति पर चलना चाहती है? राहुल गांधी देश के संविधान व लोकतंत्र को बचाने के लिए Zen G से अपील कर चुके हैं। संसद के दोनों सदनों के आसनों को भी उन्होंने पक्षपाती करार दिया है।

    अच्छी नहीं है स्थिति: चुनाव आयोग को BJP का एजेंट बताया जा रहा है। मोदी सरकार की USP रक्षा और सुरक्षा है। तो क्या विपक्ष की इसी मुद्दे पर उसे कमजोर और झूठा साबित करने की रणनीति है? सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जिस तरह का संबंध इधर दिखा है, उसमें बदलाव की तत्काल संभावना नहीं है। यह स्थिति ठीक नहीं है। राजनीति इस अवस्था में नहीं जानी चाहिए, जहां से वापस लौटा न जा सके।

    (लेखक विचारक और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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