छोटे मॉडल: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में AI पर एक अच्छा चैप्टर है, जिसे इस विषय में रुचि रखने वालों को पढ़ना चाहिए। इसमें AI एप्लिकेशन और छोटे मॉडल बनाने की सलाह दी गई है। भारतीय कंपनी Sarvam ने भारतीय भाषाओं को पढ़ने और बोलने के लिए एप्लिकेशन बनाए हैं। इसका मॉडल दो अरब पैरामीटर पर काम करता है। वहीं, गूगल और OpenAI जैसे बड़े टेक कंपनियों के ताकतवर मॉडल एक ट्रिलियन से ज्यादा पैरामीटर पर चलते हैं। इन बड़े मॉडलों को दुनिया भर में मौजूद हर तरह के उपलब्ध डेटा से ट्रेन किया जाता है।
डेटा की भरमार: कम पैरामीटर वाले छोटे AI मॉडल खास कामों के लिए बनाए जा सकते हैं। इनको प्रशिक्षित करने के लिए बड़े डेटा सेंटर की जरूरत नहीं होती। लेकिन, गौर करने वाली बात है कि दुनिया में सबसे ज्यादा डेटा भारत में जेनरेट होता है। इसकी वजह है विशाल आबादी और सस्ता इंटरनेट। अगर भारत चाहता है कि भारतीयों का डेटा देश में ही रहे, तो उसे अपने डेटा सेंटर बनाने होंगे। साथ ही, तेजी से बदलती तकनीक की दुनिया में भारत को रणनीतिक ताकत बनाए रखने के लिए अपना बड़ा AI मॉडल भी बनाना होगा।
क्या हो गेम प्लान
- भारतीयों का डेटा स्टोर करने लायक डेटा सेंटर बनें
- युवाओं को AI मॉडल बनाने के लिए ट्रेनिंग दी जाए
- चिप मेकिंग के लिए भारतीय स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन
विदेशी डेटा नहीं: भारत को डेटा सुरक्षित रखने और उसे प्रॉसेस करने के लिए बड़ी क्षमता के सेंटर्स की जरूरत है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि दुनियाभर का डेटा भारत में स्टोर किया जाए। इसके तीन कारण हैं। पहला, अगर विदेशी डेटा यहां स्टोर किया जाता है, तो उसकी प्राइवेसी की गारंटी देनी होगी। ऐसे में उस डेटा का उपयोग भारतीय AI मॉडल को ट्रेन करने में नहीं हो सकेगा। दूसरा, डेटा सेंटर बिजनेस इस तरह बनाया जाता है कि उसकी पूरी क्षमता का इस्तेमाल हो। अगर वे विदेशी डेटा से भर जाएंगे, तो भारतीय डेटा के लिए बिल्कुल नहीं या बहुत कम जगह कम बचेगी।
बिजली की चिंता: तीसरी वजह यह है कि डेटा सेंटर चलाने के लिए बहुत बिजली की जरूरत होती है। बड़े डेटा सेंटर के लिए तो हजारों मेगावाट (MW) या गीगावाट (GW) बिजली चाहिए। कुछ डिवेलपर्स कहते हैं कि इन डेटा सेंटर को चलाने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी जैसे सौर या पवन ऊर्जा, का इस्तेमाल करेंगे। लेकिन, यह ऊर्जा हर समय नहीं मिलती। जब धूप नहीं होती और हवा नहीं चलती, तब थर्मल पावर की ओर मुड़ना पड़ता है। दुनियाभर का डेटा स्टोर करने वाले विशाल सेंटर को चलाने के लिए जरूरी बिजली पैदा करने से प्रदूषण बढ़ सकता है। इससे लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ेगा, जैसा कि दिल्ली हर सर्दियों में झेलती है। इसलिए भारत उतने ही डेटा सेंटर बनाए, जो उसके लिए जरूरी हों।
चिप्स की कमी: AI डिवेलप करने के लिए गणित पर मजबूत पकड़ जरूरी है, खासकर लिनियर अलजेब्रा, कैलकुलस और Probability जैसे विषयों में। देश के युवाओं को इन विषयों में प्रशिक्षित किया जा सकता है। लेकिन, सबसे बड़ी समस्या है अत्याधुनिक चिप्स की कमी। केवल कुछ कंपनियां ही ये चिप्स डिजाइन और डिवेलप करती हैं। इनकी सप्लाई कम है और ऊपर से अमेरिका ने अडवांस्ड चिप्स के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखे हैं।
गुणवत्ता चिंताजनक: चिप की कमी से बचने का एकमात्र तरीका है कि भारत इनको खुद बनाए। सरकार की मौजूदा योजनाओं से यह संभव नहीं। विदेशी कंपनियों को सरकार की तरफ से भारत में चिप बनाने के लिए अरबों की सब्सिडी दी जा रही है। इसके बावजूद वे लो-एंड चिप ही बना रही हैं, जिनकी मोटाई 20 नैनोमीटर या उससे ज्यादा होती है। वहीं, उन्नत चिप्स की मोटाई होती है केवल दो-तीन नैनोमीटर। संभावना भी कम है कि विदेशी कंपनियां यहां फैक्ट्री लगाएं, क्योंकि तब अमेरिकी बैन का डर होगा।
देसी इकोसिस्टम: भारत में चिप बनाने के लिए पहले उन खास मशीनों को बनाना होगा, जिनसे चिप तैयार होती है। इनमें उन्नत लिथोग्राफी मशीनें शामिल हैं। इन मशीनों की बिक्री पर भी अमेरिका का नियंत्रण है। हालांकि कुछ उपकरण नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड और जापान बनाते हैं। तो भारत क्या करे? चिप मेकिंग के लिए छोटी-बड़ी जितनी भी चीजें चाहिए, उनकी लिस्ट बनानी चाहिए। फिर हर पार्ट के लिए पांच-पांच स्टार्टअप्स को फंड दिया जाए। इनमें से दो तो सफल होंगी। जो पैसा विदेशी कंपनियों को दिया जा रहा है, वही इस काम में लगाया जा सकता है। शुरुआत अभी करनी होगी। चीन ने ऐसा किया है, तो भारत भी कर सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)













