निराशा मिलेगी। आमतौर पर युद्ध शुरू होने के बाद जनता अपने राष्ट्रपति के साथ खड़ी हो जाती है। 9/11 के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की अप्रूवल रेटिंग 90% से भी ऊपर पहुंच गई थी। लेकिन अगर डॉनल्ड ट्रंप को लग रहा है कि वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप का भी वैसा ही असर होगा, तो उन्हें भारी निराशा हाथ लगने वाली है।
अमेरिकी नागरिक ही हो रहे नाराज। वेनेजुएला पर हमले के पहले जब अमेरिका ने ड्रग्स ले जाने के आरोप में उसकी नावों को निशाना बनाया था, तब भी केवल 40% अमेरिकी ही इससे सहमत थे। अब ट्रंप के लिए नई मुश्किल ये आई है कि खुद के देश के लोग नाराज हो गए हैं। वेनेजुएला पर बमबारी, वहां जबरन सत्ता परिवर्तन या सेना उतारने को लेकर तो जनता का समर्थन और भी कम था। ऐसा इसलिए नहीं कि ट्रंप की लोकप्रियता लगातार गिर रही है, बल्कि इसलिए कि पूरा मामला इराक और अफगानिस्तान जैसे लगता है, जहां लंबे युद्ध के बाद भी हासिल कुछ नहीं रहा।
जनता का नजरिया। विदेशी युद्धों को अमेरिकी जनता दो ही नजरिये से देखती है एक तो दूसरे विश्व युद्ध की तरह, जो नैतिक रूप से सही था और निर्णायक जीत के साथ खत्म हुआ। दूसरा नजरिया है वियतनाम, जहां की लड़ाई से अमेरिका को कुछ नहीं मिला। इराक में घुसने से पहले बुश प्रशासन ने जनता को यह समझाने में काफी मेहनत की थी कि यह युद्ध दूसरे विश्व युद्ध जैसा होगा। जैसे-जैसे इराक की लड़ाई वियतनाम जैसी लगने लगी, जनता खिलाफ हो गई।
इराक से समानता। वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप को लेकर बहस उसकी मेरिट पर नहीं, बल्कि इस पर है कि इस अभियान को कैसे पेश किया जाता है। जनता पसंद नहीं करेगी। ट्रंप प्रशासन की मुश्किल
वेनेजुएला में ऑपरेशन और इराक में घुसपैठ में कई समानताएं। अमेरिका एक विदेशी नेता पर हमला कर रहा है, जिसकी वैधानिकता पर विवाद है और जिसके आतंकियों से कनेक्शन हैं। लेकिन, इसकी वजह से स्थिति और बिगड़ सकती है, जिसे अमेरिकी सैन्य अभियान को व्यापक समर्थन नहीं मिल रहा जनता को अफगानिस्तान जैसा लग रहा मामला सरकार नहीं बता पा रही कि आगे क्या करना है कंट्रोल का मतलब।
एक दूसरा विकल्प भी है, 1989 में अमेरिका ने पनामा के नेता Manuel Noriega को ड्रग्स तस्करी के आरोप में पद से हटा दिया था। वेनेजुएला में भी अगर ऐसा ही किया जाए, तो जनता को अच्छा लगेगा। तब सरकार कह सकती है कि हम केवल बुरे लोगों को हटाकर वापस लौट रहे हैं, लेकिन ट्रंप ने इस नैरेटिव को पहले ही खत्म कर दिया है। उन्होंने कहा कि अब वेनेजुएला का कंट्रोल अमेरिका के पास है।
मेहनत नहीं की। असल में ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला पर हमले को इस तरह पेश करने का प्रयास ही नहीं किया, जिससे समर्थन जुटाने जा सके। इसके उलट, बुश प्रशासन ने इराक युद्ध को सही ठहराने के लिए महीनों मेहनत की थी। एक वक्त 70% अमेरिकी इस बात के पक्ष में थे कि इराक पर हमला करना चाहिए। दूसरी ओर, ट्रंप के ऑपरेशन को अधिकतम 45% समर्थन मिलता दिख रहा है। और अभी तो सैन्य सफलता का उत्साह है, जब सवाल उठेगा कि ‘अब आगे क्या’ तब समर्थन गिरेगा।
आर्थिक संकट। ट्रंप अगले कुछ हफ्तों में एक बजट पास कराना चाहेंगे, वरना फिर गवर्नमेंट शटडाउन का सामना करना पड़ेगा। ट्रंप कह चुके हैं कि वह टैक्स में और ज्यादा कटौती, स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार और ऐसी कई चीजें चाहते हैं, जिसके लिए कांग्रेस का सहयोग चाहिए। लेकिन उनकी लोकप्रियता जितनी कम होगी, उनके लिए रिपब्लिकन्स के वोट जुटाना उतना ही मुश्किल होगा।
दोहरा घाटा। टीवी स्क्रीन पर बम गिरते हुए देखना और फिर जोरदार धमाका होना भीड़ को पसंद आता है। इससे पता चलता है कि सेना पर हर साल जो ट्रिलियन डॉलर खर्च किए जा रहे हैं, उसका असर हो रहा है। लेकिन, जनता को कोई वाजिब कारण और यह बताए बिना कि आगे क्या होने वाला है, युद्ध में उतरना ट्रंप और वेनेजुएला दोनों के लिए ही घातक हो सकता है।














