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  • शाहिद कपूर Exclusive: पपाराजी को कभी प्यार से हैंडल करता हूं, तो कभी गुस्से से

    एक्टिंग की दुनिया में तकरीबन ढाई दशकों में हर तरह की भूमिकाओं में जान डालने वाले शाहिद कपूर किरदारों के मामले में रिस्क लेने से नहीं हिचकिचाते। रूमानी किरदारों में सराहे गए शाहिद ने अपनी उस चॉकलेटी बॉय की इमेज से निकलने के लिए ‘कमीने’ जैसी ग्रे शेड वाली भूमिका करने से भी परहेज नहीं


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    By Azad Hind Desk फरवरी 7, 2026
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    एक्टिंग की दुनिया में तकरीबन ढाई दशकों में हर तरह की भूमिकाओं में जान डालने वाले शाहिद कपूर किरदारों के मामले में रिस्क लेने से नहीं हिचकिचाते। रूमानी किरदारों में सराहे गए शाहिद ने अपनी उस चॉकलेटी बॉय की इमेज से निकलने के लिए ‘कमीने’ जैसी ग्रे शेड वाली भूमिका करने से भी परहेज नहीं किया। ‘हैदर’, ‘उड़ता पंजाब’, ‘कबीर सिंह’, ‘जर्सी’ और ‘फर्जी’ जैसी अलग-अलग किरदार कर चुके शाहिद इन दिनों ‘ओ रोमियो’ में एक अलग अंदाज में दिख रहे हैं। उनसे एक खास बातचीत।

    करियर की शुरुआत में आप ऑडिशन दर ऑडिशन देते जाते थे और आज आपके लिए रोल लिखे जाते हैं?

    क्या वाकई मेरे लिए रोल लिखे जाते हैं? (हंसते हुए) मैं खुद को इतनी अहमियत नहीं देता, मगर ये सच है कि ‘इश्क विश्क’ से पहले मैं तकरीबन 200 ऑडिशन कर चुका था। मैं समझता हूं कि एक कलाकार को खुद को समय के साथ संवारते और निखारते हुए आगे बढ़ना चाहिए। मैं तो शुरुआत से ही एक समय में एक ही फिल्म करने में यकीन रखता हूं। आज हमारी पूरी फिल्म फ्रेटर्निटी इस बात को समझ चुकी है कि हमें एक वक्त में एक ही फिल्म पर फोकस करना होगा।

    आपने शुरुआत रोमांटिक रोल्स से की, मगर आगे चल कर आप ‘कमीने’, ‘उड़ता पंजाब’, ‘कबीर सिंह’ और ‘फर्जी’ जैसी भूमिकाओं की तरफ झुक गए?

    -एक अदाकार के रूप में आपको लड़ना पड़ता है, साबित करना पड़ता है कि आप सिर्फ एक ही तरह की भूमिका नहीं बल्कि कई तरह के रोल्स कर सकते हैं। क्या होता है न कि जब आपको एक रोल में सक्सेस मिल जाती है, तो लोग उसी तरह के किरदार ऑफर करने लगते हैं, तो आपको उससे अलग हटकर करने का जुनून होना चाहिए कि मुझे किसी एक बॉक्स में मत डालो, वरना आप उस लूप में फंस जाते हैं।

    तो क्या आप कभी उस लूप में फंसे?

    – मैं तो उस लूप में शुरुआत के समय में ही फंस गया था। अब 2026 चल रहा है। 2003 में मैंने ‘इश्क विश्क’ से अपने करियर की शुरुआत की थी। लोग मुझे लवर बॉय के रूप में ही देखना चाहते थे। मगर फिर विशाल सर (निर्देशक विशाल भारद्वाज) ने मुझे ‘कमीने’ देकर उस चक्र से बाहर निकाला। अब विशाल सर के साथ ‘कमीने’, ‘हैदर’ और ‘रंगून’ के बाद ‘ओ रोमियो’ मेरी चौथी फिल्म है। ये विशाल सर की खूबी है कि वह किरदारों का जो अलहदा संसार रचते हैं, उसमें एक कलाकार को हमेशा कुछ नया करने को इंस्पायर करते हैं। अब ‘कमीने’ से काफी अलग थी ‘हैदर’ और अब यह फिल्म बिलकुल अलग जोन की है।

    मैंने उस फिल्म के लिए पैसे नहीं लिए थे। अगर मैं अपनी फीस लेता तो वो फिल्म नहीं बन पाती, क्योंकि वो फिल्म काफी एक्सपेरिमेंटल थी। जब मुझे उस फिल्म का प्रस्ताव मिला, तो मुझे लगा कि अगर ये कहानी हम बना पाए और मैं इस रोल को कर पाया, तो ये फिल्म मेरे लिए एक खास फिल्म साबित होगी।
    ‘हैदर’ पर शाहिद कपूर

    फिल्ममेकर विशाल भारद्वाज के साथ आपकी जोड़ी और केमिस्ट्री काफी अलग मानी जाती है, हमने सुना है कि आपने उनके निर्देशन वाली ‘हैदर’ के लिए आपने अपनी फीस नहीं ली थी?

    -हां, मैंने उस फिल्म के लिए पैसे नहीं लिए थे। अगर मैं अपनी फीस लेता तो वो फिल्म नहीं बन पाती, क्योंकि वो फिल्म काफी एक्सपेरिमेंटल थी। जब मुझे उस फिल्म का प्रस्ताव मिला, तो मुझे लगा कि अगर ये कहानी हम बना पाए और मैं इस रोल को कर पाया, तो ये फिल्म मेरे लिए एक खास फिल्म साबित होगी। कमाल की बात ये है कि वो उसी तरह की फिल्म साबित हुई, सच कहूं, तो वो पैसे वाली फिल्म थी ही नहीं। एक एक्टर और सिनेमा प्रेमी को भाने वाली फिल्म थी वो। तो कभी-कभी ऐसी फिल्में एक कलाकार को कर लेनी चाहिए।

    शाहिद अपने करियर में आप सबसे मुश्किल दौर से कब गुजरे?

    -मुश्किल दौर हर समय होता है। देखिए हमारी इंडस्ट्री में रेलेवंस, सामयिकता बहुत जरूरी है, एक एक्टर और स्टार के रूप में। ये दोनों चीजें साथ में चलती हैं। लोग मुझसे परफॉर्मेंस की उम्मीद करते हैं और ये भी कहते हैं कि मुझमें एक तरह का स्टारडम है, तो फिर उसे एक साथ में लेकर चलना बड़ा मुश्किल होता है। मुझे किसी इमेज में बंधना पसंद नहीं है। कभी-कभी स्टारडम आपको बांध देता है कि यही करो, यही अच्छा लग रहा है। मुझे लगता है कि मैं खुलकर एक्सप्लोर करूं, अलग भूमिकाएं करूं, मगर साथ ही मैं स्टारडम भी चाहता हूं, तो फिर वो जद्दोजहद जो होती है, उसे मैनेज करना बहुत मुश्किल होता है। फिर आजकल दर्शकों का मूड बदलता रहता है। कभी-कभी लगता है कि उनका मूड अच्छा है और कभी लगता है कि क्या अजीब-सा मूड है। तो ये आसान नहीं है।

    आप मीशा और ज़ैन जैसे दो बच्चों के पिता हैं, क्या बच्चे आपके स्टारडम से वाकिफ हैं? वो आपकी फिल्में देखते हैं?

    -बिल्कुल वाकिफ हैं। उन्हें पता होना चाहिए कि उनके पिता क्या काम करते हैं। जहां तक फिल्मों की बात है, तो जो फिल्में वो देख सकते हैं, जरूर देखते हैं। जाहिर है, मेरी सभी फिल्में बच्चों के देखने योग्य नहीं होती। (मुस्कुराते हैं) उन्होंने ‘जब वी मेट’ देखी थी, ‘तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’ भी उन्हें पसंद आई थी। मेरी स्वीट फिल्में उन्होंने देखी हैं।

    मुश्किल दौर हर समय होता है। देखिए हमारी इंडस्ट्री में रेलेवंस, सामयिकता बहुत जरूरी है, एक एक्टर और स्टार के रूप में। ये दोनों चीजें साथ में चलती हैं। लोग मुझसे परफॉर्मेंस की उम्मीद करते हैं और ये भी कहते हैं कि मुझमें एक तरह का स्टारडम है, तो फिर उसे एक साथ में लेकर चलना बड़ा मुश्किल होता है। फिर आजकल दर्शकों का मूड बदलता रहता है। कभी-कभी लगता है कि उनका मूड अच्छा है और कभी लगता है कि क्या अजीब-सा मूड है। तो ये आसान नहीं है।
    शाहिद कपूर

    आजकल के सोशल मीडिया और निरंतर पीछा करने वाले कैमरे और पैपराजी को आप कैसे हैंडल करते हैं?

    – आप विडियोज में देखती होंगी कि मैं कैसे हैंडल करता हूं (ठहाका लगाते हुए) कभी प्यार से और कभी थोड़ा गुस्से से।

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