‘रोज याद दिलाता हूं, मीरा कितनी स्पेशल हैं’
‘नवभारत टाइम्स’ से खास बातचीत के दौरान शाहिद ने शादी को 10 साल बाद वैलेंटाइंस डे की अहमियत पर बात करते हुए कहा, ‘मैं अपनी बीवी के साथ हर दिन वैलेंटाइंस डे मनाता हूं। मेरा मानना है कि वह इतनी स्पेशल हैं कि मुझे हर दिन उन्हें याद दिलाना चाहिए कि वो मेरे लिए कितनी मायने रखती हैं।’
‘असल जिंदगी में लोग ग्रे ही होते हैं’
करियर के शुरुआत में चॉकलेटी बॉय वाली इमेज रखने वाले शाहिद ने ‘कमीने’, ‘उड़ता पंजाब’ और ‘हैदर’ जैसी फिल्मों में ग्रे किरदारों में मजबूत छाप छाेड़ी है। ‘ओ रोमियो’ में भी वह गैंगस्टर हुसैन उस्तरा की ग्रे भूमिका में हैं। ऐसे रोल पर वह कहते हैं, ‘इस तरह की भूमिकाएं हमें बतौर एक्टर खुद को खोजने का मौका देती हैं। मुझे लगता है कि ज़िंदगी में लोग ग्रे ही होते हैं। कई बार लोग अपने बारे में यह बात नहीं मानते, लेकिन उनके दोस्त और रिश्तेदार बताते हैं।’
‘कभी उनके बच्चे बड़े होकर बताते हैं कि आपने ऐसा किया था, वैसा किया था। हम सब वैसे होते हैं। हम सभी के अंदर एक ग्रे साइड होता है। जैसे विशाल सर (फिल्ममेकर विशाल भारद्वाज) हमेशा कहते हैं और मुझे भी ऐसे ही लगता है कि फिल्मों में किरदार खुद को एक्सपोज करता है। वह आपको अपनी सच्चाई दिखाता है। मैं कितना अच्छा हूं, ये बताने वाला कैरेक्टर करना एक्टिंग नहीं होती है। वो कुछ और होता है। एक्टिंग वही होती है, जब आप कैरेक्टर के हर पहलू को ऑडियंस को दिखाने से कतराते नहीं हैं। वो अच्छा-बुरा जो है, उसे ईमानदारी से दिखा देते हैं और मुझे लगता है कि आज ऑडियंस इतनी मैच्योर हैं कि वह इस चीज को सराहती हैं।’
‘फिल्में एक्सप्रेस करने का जरिया’
कई एक्टर्स ये भी कहते हैं कि जो चीजें वो रियल लाइफ में नहीं कर सकते, उसे पर्दे पर दिखाने में एक अलग लुत्फ होता है। शाहिद इस पर कहते हैं, ‘मेरी एक्टर बनने की वजह यह नहीं थी कि मैं जो चीजें असल जिंदगी में नहीं कर सकता, वह पर्दे पर करना है तो मुझे एक्टर बनना है। मुझे फिल्मों और एक्टिंग से मोहब्बत थी, अभी भी है। मुझे लगता है कि एक्टिंग में आपको एक मौका मिलता है अपने आपको एक्सप्लोर करने का, जिंदगी में जो भी आपने अनुभव किए हैं, उसे एक्सप्रेस करने का। क्रिएटिव लोग जो होते हैं, उन्हें एक जरिया मिल जाता है उसे एक्सप्रेस करने का। हमारे (क्रिएटिव लोगों के) लिए एक्सप्रेस करना जरूरी होता है।’
‘जो दिल छूती हैं, वे फिल्में याद रहती हैं’
‘देवदास’ से लेकर ‘लैला मजनू’ और ‘कबीर सिंह’ तक, इश्क में खुद को तबाह करने वाली जुनूनी प्रेम कहानियां बॉलीवुड फिल्मों में काफी देखी जाती हैं। क्या असल जिंदगी में प्यार इस कदर जुनूनी होता है या बॉलीवुड इसे रोमांटिसाइज ज्यादा करता है? इस सवाल पर शाहिद का कहना है, ‘जो चीजें आक्रामक होती हैं, वो ज्यादा उठकर आती हैं। हर चीज का एक असर होता है। फिल्मों के मामले में भी ऐसा ही है। जो फिल्में ज्यादा गहरी होती हैं, भावनात्मक रूप से मजबूत होती हैं, वो अंदर तक जाकर आपके दिल को चीरकर आपको कुछ फील करा देती हैं। हल्की फुल्की फिल्मों में वह बात महसूस नहीं होगी। हल्की फुल्की फिल्में देखकर कुछ टाइम बाद आप उसे भूल जाते हैं। जबकि, कुछ ऐसी फिल्में होती हैं जो अंदर तक आपको छू जाती हैं, गहराई वाला अनुभव देती हैं। आपके मन में एक छाप छोड़ जाती हैं, इसलिए वे आपको ज्यादा याद रह जाती हैं।’













