जाहिर है चुनावों से पहले ही सभी राजनीतिक पक्षों के साथ इंगेज कर रहे भारत के लिए भी ये नतीजे खासे अहम हैं। भारत के नेतृत्व ने ये बताने में देर नहीं लगाई कि वो बीएनपी और तारिक रहमान को युनूस प्रशासन से अलग देख रहा है। चुनी हुई सरकार के साथ कूटनीतिक इंगेजमेंट भारत की नेबरहु़ड फर्स्ट की नीति को ही आगे लेकर चलती है।
दिल्ली के संदेश के मायने क्या हैं?
दिल्ली का संदेश आगे की राह दिखाता है- अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार अनिल त्रिगुणायत का कहना है कि भारत के पास दो विकल्प थे, बीएनपी और जमात में से किसी का एक चुनाव। भारत के लिए राहत की बात ये रही कि बीएनपी ने अपना चुनाव जमात की तरह कट्टरपंथी पैटर्न पर नहीं लड़ा। मौजूदा बीएनपी, खालिदा जिया के वक्त की बीएनपी से अलग है। तारिक रहमान एक युवा नेतृत्व हैं जिनके हाल के बयान कहीं से विवादास्पद नहीं रहे हैं।
विदेश मंत्री जयशंकर और हाई कमिश्नर के साथ हुई उनकी मुलाकात ने भारत के इंगेजमेंट को सक्रिय ही रखा। उनकी मां, जिया के कार्यकाल में भी फंक्शनल द्विपक्षीय रिश्ते तो थे। ऐसे में भारत ये उम्मीद नहीं कर रहा है कि बांग्लादेश हमारे बहुत अच्छे दोस्त बन जाएंगे, लेकिन अगर ढाका हमारी सुरक्षा चिंताओं का ध्यान रखता है, संवेदनशीलता को समझता है तो भारत को भी अपनी नेबरहुड फर्स्ट की नीति को कायम रखने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी
शेख हसीना के मुद्दे से आगे बढ़ना होगा
बांग्लादेश को हसीना के मुद्दे से आगे जाना होगा- जानकारों का कहना है कि भले ही तारिक रहमान और बीएनपी अपने चुनावी मेनिफेस्टो में बांग्लादेश फर्स्ट और भारत के साथ जल बंटवारे का मुद्दा उठाते रहे हैं, लेकिन ये ऐसे लोकल मुद्दे हैं, जो चुनावों के दौरान किसी भी देश के राजनीतिक दल उठाते ही है, वो भी तब जबकि वहां समाज के एक तबके में भारत विरोध का सेंटिमेंट रहा हो।
लेकिन रहमान की पहली प्राथमिकता अपने देश को अस्थिरता से बाहर निकालने की होगी। ऐसे में भारत जैसे पड़ोसी देश के साथ सामान्य रिश्ते भी इसी कड़ी का एक हिस्सा साबित हो सकते हैं, जिन्हें वो हसीना के प्रत्यर्पण की मांग का बंधक बनाना नहीं चाहेंगे। चुनाव से पहले पड़ोसियों से बेहतर संबंध की वकालत करते रहे
संवैधानिक बदलाव, शक्ति संतुलन चुनौती
संवैधानिक बदलाव और शक्ति संतुलन भी एक चुनौती- बांग्लादेश में चुनाव से ज्यादा अहम अब जनमत संग्रह के बाद देश के राजनीतिक ढांचे में होने वाले बदलाव हैं। इनमें से एक अहम बदलाव राष्ट्रपति और पीएम के बीच शक्तियों के बंटवारे को लेकर है, ऐसे में आने वाले दिनों में शक्तियों का पलड़ा किसके पक्ष में लुढ़कता है, वो भी विदेश नीति और द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से अहम होगा। जानकार कहते हैं कि आने वाले दिन बांग्लादेश में बहुत कुछ अंदरूनी बदलाव होंगे और भारत उस पर भी निगाह बनाए रखेगा।
असहज पड़ोसी के साथ सहजता से काम
शेख हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर युनूस प्रशासन का भारत के साथ रूख तल्ख रहा। बीते साल बैंकॉक में पीएम मोदी और मोहम्मद युनूस की मुलाकात से भी बर्फ नहीं पिघली। हालांकि बीते साल बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नवंबर में भारत दौरे पर आए थे। उसी दौरान उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के साथ भी मुलाकात हुई थी।
माना जाता है उस दौरान दोनों देशों के बीच सामान्य संबंधों की जरूरत को दोनों ओर से जाहिर किया गया था। कहीं ना कहीं भारत भी ये जानता था कि शेख हसीना के लिए फिलहाल बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य में लौटना दूर की कौड़ी है और इस सच को समझ कर असहज पड़ोसी के साथ सहजता पर काम करना ही पड़ेगा।













