इन देशों ने अमेरिका में गुरुवार को होने वाली बोर्ड ऑफ पीस की बैठक से पहले वेस्ट बैंक में इजरायल के एकतरा कदमों की आलोचना की है। भारत के संदर्भ में इस यूटर्न इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि शुरू में भारत ने इससे दूरी बना रखी थी, लेकिन बाद में भारत भी इसमें शामिल हो गया। संयुक्त बयान मंगलवार (17 फरवरी 2026) को जारी किया गया और इसे यूनाइटेड नेशंस (UN) में फिलिस्तीनी राजदूत ने पढ़ा है और उनके साथ दर्जनों देशों के डिप्लोमैट भी शामिल थे जिन्होंने डॉक्यूमेंट पर हस्ताक्षर किए हैं।
भारत ने वेस्टबैंक को लेकर इजरायल की आलोचना की
शुरुआत में (17 फरवरी को) जब 85 देशों ने यह बयान जारी किया था, तब भारत का नाम उस सूची में नहीं था। लेकिन बुधवार (18 फरवरी) देर रात समय सीमा खत्म होने से ठीक पहले भारत ने अपना समर्थन देकर सबको चौंका दिया। UN में फिलीस्तीन के राजदूत रियाद मंसूर ने कहा कि “हम वेस्ट बैंक में इजरायल की गैर-कानूनी मौजूदगी को बढ़ाने के मकसद से लिए गए एकतरफा इजरायली फैसलों और कदमों की कड़ी निंदा करते हैं।”
मंसूर ने कहा कि “हम इस बारे में किसी भी तरह के कब्जे का कड़ा विरोध करते हैं।” उन्होंने अपने बयान में उन सभी कदमों को खारिज कर दिया है जिनका मकसद “पूर्वी यरुशलम समेत 1967 से कब्जे वाले फिलीस्तीनी इलाके की डेमोग्राफिक बनावट खासियत और हैसियत को बदलना है।”
वेस्ट बैंक को लेकर ताजा विवाद क्या है- दरअसल, इजरायल ने वेस्ट बैंक के बड़े हिस्से को ‘राज्य भूमि’ यानि स्टेट लैंड घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की है। जिसकी आलोचना की जा रही है। इसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय फिलीस्तीन की जमीन पर “कब्जा” मान रहा है।
वेस्ट बैंक पर कब्जे के लिए इजरायल का प्लान क्या है?
गाजा में युद्धविराम होने के बाद इजरायली नेसेट (संसद) ने फिलीस्तीनी वेस्ट बैंक के “A” और “B” क्षेत्र में जमीन पर अपना कंट्रोल मजबूत करने के लिए कई प्रस्ताव पास किए हैं। जिन्हें ओस्लो समझौते (1993-1995) के बाद से फिलीस्तीनी अथॉरिटी मैनेज करती रही है। इजरायली संसद ने बाहरी लोगों के इस क्षेत्र में जमीन खरीदने पर लगी रोक हटा दी है। इसके अलावा इस क्षेत्र में अभी रहने वाले लोगों के डॉक्यूमेंट्स की जांच होगी। माना जा रहा है कि ऐसा करके यहां रहने वाले लोगों को हटाने की योजना बनाई गई है। इजरायल, पहले भी ऐसा कर चुका है।
फिलीस्तीन के राजदूत की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि “ऐसे कदम अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हैं, इलाके में शांति और स्थिरता के लिए चल रही कोशिशों को कमजोर करते हैं और लड़ाई खत्म करने वाले शांति समझौते तक पहुंचने की उम्मीद को खतरे में डालते हैं।”
भारत की आलोचना क्यों की जा रही थी?
वहीं, इस लिस्ट में शामिल देशों में भारत का नाम नहीं होने की आलोचना की जा रही थी। कुछ पूर्व भारतीय डिप्लोमेट्स ने गंभीर सवाल उठाए थे। ईरान में भारत के पूर्व राजदूत केसी सिंह ने इसे “अफसोस की बात” कहा था। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा था कि “क्या भारत ने खुलेआम इजरायल का साथ चुन लिया है और क्या यह कदम अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों को बेहतर बनाने से भी जुड़ा है।”
भारत की पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने भी इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष पर भारत की सामान्य स्थिति का जिक्र करते हुए लिखा था कि “रणनीतिक स्वायत्ता का मतलब भारत के विकल्पों को बढ़ाना था, न कि उसकी नैतिक शब्दावली को कम करना। अगर स्वायत्तता पूरी तरह से सामान्य बातों से बचने में बदल जाती है, तो यह आजादी कम और बचाव ज्यायादा लगने लगता है।”
भारत के लिए ये स्थिति थोड़ा परेशान करने वाली इसलिए थी क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 25-26 फरवरी को इजरायल दौरे पर होंगे। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू खुद इसकी पुष्टि कर चुके हैं। और इस लिस्ट में अपना नाम शामिल करना यह रुख दिखाता है कि भारत, इजरायल के साथ दोस्ती के बावजूद फिलीस्तीन मुद्दे पर अपने पुराने सैद्धांतिक स्टैंड पर कायम है।













