यमन संकट भारत के लिए अलग चुनौती
ET की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत ने सऊदी अरब और यूएई के बीच जारी संघर्ष से खुद को दूर रखने का फैसला किया है। खाड़ी के इन दोनों ही मुस्लिम देशों में जारी विवाद को लेकर भारत ने अबतक कोई बयान जारी नहीं किया है। इस मामले की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति ने बताया है कि इसकी वजह ये है कि खाड़ी के दोनों ही दोनों ही देशों की लड़ाई में भारत खुद को शामिल होते नहीं दिखना चाहता। यमन में जारी संघर्ष पर भारत नजदीकी नजर रख रहा है और यह देख रहा है कि आखिर ऊंट किस करवट बैठता है।
सऊदी अरब और यूएई में संघर्ष की वजह
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात दोनों ही यमन पर अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। इसके लिए सऊदी अरब एकीकृत यमन का समर्थन कर रहा है, वहीं यूएई दक्षिणी यमन के अलगावादियों का साथ दे रहा है। दरअसल, यमन पर नियंत्रण दोनों ही देशों के लिए सामरिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से यह दोनों ही खाड़ी देश लाल सागर, हिंद महासागर क्षेत्र और हॉर्न ऑफ अफ्रीका तक अपना दबदबा बनाना चाहते हैं।
सऊदी अरब-यूएई संघर्ष क्यों है चुनौती
भारत का सऊदी अरब और यूएई दोनों ही देशों के साथ गहरे सामरिक और आर्थिक संबंध स्थापित हैं। पश्चिम एशिया के इन दोनों ही देशों के साथ अच्छे रिश्ते भारत के लिए कच्चे तेल की सप्लाई, आपसी व्यापार और इस क्षेत्र में रहने वाले भारतीयों की बड़ी आबादी को देखते हुए महत्वपूर्ण हैं।
भारत और सऊदी अरब के बीच संबंध
भारत और सऊदी अरब के बीच दशकों पुराने मजबूत संबंध रहे हैं। इसकी शुरुआत 1947 में ही हुई थी और 2010 में इसे नए सिरे से नई ताकत मिली। आज भारत सऊदी अरब से निवेश (विजन 2030)बढ़ाने की कोशिशों में लगा है और यह ऐसा मुल्क है, जो भारत के लिए एक्सपोर्ट का और भी बड़ा डेस्टिनेशन बनकर उभरने की क्षमता रखता है। खाड़ी क्षेत्र में सबसे ज्यादा भारतीय सऊदी अरब में ही रहते हैं और यह क्षेत्र से भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल का सप्लायर भी है।
भारत और यूएई के बीच संबंध
बीते एक दशक में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पश्चिम एशिया में भारत का प्रमुख भागीदार बनकर उभरा है। दोनों देशों के रिश्तों को मिली नई ताकत का अंदाजा इसी से लग सकता है कि 2015 से अबतक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकेले सात बार यूएई की यात्रा कर चुके हैं। दोनों देशों के विदेश और वाणिज्य मंत्रियों की एक-दूसरे के यहां आना-जाना लगातार हो रहा है। खासकर जब से यूएई ने अमेरिका की मध्यस्थता वाले ‘अब्राहम एकॉर्ड्स’ के तहत इजराइल को मान्यता दी है, जिसके बाद से दोनों देशों के बीच संबंध और भी बेहतर हुए हैं। यहां भी करीब 35 लाख भारतीय हैं और हाल के वर्षों में दोनों देशों में रक्षा सहयोग में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। इनके अलावा एआई,अंतरिक्ष और ऊर्जा क्षेत्रों में भी आपसी भरोसा बढ़ा है, साथ ही दोनों देश सांस्कृतिक तौर पर भी काफी करीब आ चुके हैं।
ऐसे में खाड़ी के दोनों ही मुस्लिम देशों में से किसी को भी मायूस करना भारत के लिए अभी के लिए समझदारी नहीं है। इसी वजह से इन दोनों के बीच संघर्ष से खुद को बराबर की दूरी पर रखना ही भारतीय कूटनीति के लिए फायदेमंद है।













