सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की ओर से परमाणु बम को लेकर कई मौकों पर बयान दिए गए हैं। मोहम्मद बिन सलमान कह चुके हैं कि सऊदी न्यूक्लियर वेपन हासिल नहीं करना चाहता लेकिन ईरान ने बम बनाया तो उनका देश भी इस पर बढ़ेगा। सऊदी ने बीते साल परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान के साथ नाटो जैसा सुरक्षा समझौता भी किया है।
सऊदी अरब-अमेरिका की डील
एपी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अमेरिका के साथ प्रस्तावित डील के तहत सऊदी अरब को सेंट्रीफ्यूज मिलेंगे। सेंट्रीफ्यूज से न्यूक्लियर वेपन के करीब जाने का रास्ता खुलता है। आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन में डायरेक्टर केल्सी डेवनपोर्ट कहते हैं कि न्यूक्लियर कोऑपरेशन नॉनप्रोलिफरेशन नॉर्म्स को बनाए रखने में अच्छा हो सकता है लेकिन असल चीजें डिटेल में हैं।
डेवनपोर्ट ने कहा, ‘कांग्रेस के डॉक्यूमेंट से साफ है कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट से पैदा होने वाले प्रोलिफरेशन रिस्क बढ़ाता है। ऐसा लगता है कि इस एग्रीमेंट से परमाणु हथियार के करीब जाने की जो मिसाल बन सकती है, उस पर ठीक से विचार नहीं किया है। अमेरिका को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है।’
अमेरिका कैसे कर सकता है मदद
डेवनपोर्ट कहते हैं कि द्विपक्षीय सेफगार्ड एग्रीमेंट सऊदी अरब के लिए यूरेनियम-एनरिचमेंट टेक्नोलॉजी या क्षमता हासिल करने का रास्ता खोल देगा। इसमें शायद वह अमेरिका से भी मदद ले सकेगा। पाबंदियों और लिमिट के बावजूद ऐसा लगता है कि सऊदी अरब के पास किसी तरह के यूरेनियम एनरिचमेंट के बारे में जानकारी तक पहुंच का रास्ता होगा।
कांग्रेस के डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि सऊदी अरब के साथ डील अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी हितों को बढ़ाएगी। साथ ही यह अमेरिकी इंडस्ट्री को नुकसान पहुंचाने के लिए इस्तेमाल की गई इनएक्शन और इनडिसीजन की फेल पॉलिसीज को तोड़ेगी। इसमें आगे कहा गया है कि वॉशिंगटन अलग-अलग देशों के साथ ऐसी 20 डील करना चाहता है।
डॉक्यूमेंट के मुताबिक, अमेरिका-सऊदी डील की निगरानी इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) करेगी, जो यूनाइटेड नेशंस की न्यूक्लियर वॉचडॉग है। इसमें संभावित न्यूक्लियर सहयोग के सबसे ज्यादा प्रसार-संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी शामिल है। इसका मतलब है न्यूक्लियर फ्यूल एनरिचमेंट, फ्यूल फैब्रिकेशन और रीप्रोसेसिंग पर नजर रहेगी।













