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  • सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद थम जाएगा विवाद? अरावली पहाड़ियों को लेकर नीलम अहलूवालिया का इंटरव्यू

    अरावली रेंज की 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को इसका हिस्सा न मानने के अपने ही आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। अरावली संरक्षण में जुटे एक्टिविस्ट और पर्यावरणविद् इसका स्वागत कर रहे हैं। लेकिन उन्हें चिंता है कि अब एक्सपर्ट कमिटी तय करेगी कि अरावली का हिस्सा क्या है और


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    By Azad Hind Desk जनवरी 10, 2026
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    अरावली रेंज की 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को इसका हिस्सा न मानने के अपने ही आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। अरावली संरक्षण में जुटे एक्टिविस्ट और पर्यावरणविद् इसका स्वागत कर रहे हैं। लेकिन उन्हें चिंता है कि अब एक्सपर्ट कमिटी तय करेगी कि अरावली का हिस्सा क्या है और क्या नहीं। उनका मानना है कि अरावली को परिभाषित करने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसके पूर्ण संरक्षण और बचाव की दरकार है। पूनम गौड़ ने अरावली पर्वतमाला से जुड़े पूरे विवाद पर पीपल फॉर अरावली की फाउंडर मेंबर और अरावली विरासत जन अभियान की सदस्य नीलम अहलूवालिया से बातचीत कीः

    सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा पर रोक लगा दी है। आपकी इस पर क्या राय है?
    फैसले का हम स्वागत करते हैं। लेकिन अब एक्सपर्ट कमेटियां तय करेंगी कि अरावली का हिस्सा क्या है और क्या नहीं? अरावली को परिभाषित करने की जरूरत नहीं है। उसके पूर्ण संरक्षण और बचाव की जरूरत है, क्योंकि यह पहले ही खनन और रीयल एस्टेट की वजह से बहुत बर्बाद हो चुकी है।

    क्या स्टे के बाद विवाद थम जाएगा ?
    नहीं, अरावली को जब तक पूरी तरह संरक्षण नहीं मिलता, तब तक विवाद रहेगा। लंबे समय से अरावली को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं। अवैध खनन समेत कई मुद्दे हैं, जिनके खिलाफ लोग आवाज उठा रहे हैं। आंदोलन जारी रहेगा।

    सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की जिस नई परिभाषा को मंजूरी दी, उस पर क्या विवाद है?
    20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैली अरावली की नई परिभाषा को मंजूरी दी। इसमें उन्हीं पहाड़ियों को अरावली मानने की बात थी जो 100 मीटर या इससे अधिक ऊंची हो। यानी 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियां अरावली का हिस्सा नहीं रहेंगी। अरावली का गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में काफी हिस्सा कम ऊंचाई वाला ही है। नई परिभाषा से यह क्षेत्र कानूनी संरक्षण के दायरे में नहीं आता।

    इसका क्या और कितना असर पड़ता ?
    हरियाणा का फॉरेस्ट कवर देश में सबसे कम है। यह सिर्फ 3.6% है। नई परिभाषा से यह और अधिक सिमट सकता है। राज्य में ज्यादातर जंगल अरावली की कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों के आसपास ही हैं। ये पहाड़ियां 100 मीटर से ऊंची नहीं है। नई परिभाषा से अरावली में माइनिंग और रीयल एस्टेट कंपनियों की पहुंच आसान हो जाएगी। राजस्थान और गुजरात में भी अरावली के कई इलाके खनन आदि के लिए खुल जाएंगे।

    अब यहां से आगे अरावली विरासत जन अभियान का क्या रुख होगा ?
    अरावली विरासत जन अभियान जारी रहेगा। अब हमारी मांग पूरी तरह सहभागी और पारदर्शी प्रक्रिया के लिए है। हम ऐसी प्रक्रिया नहीं चाहते जो केवल एमिकस (Amicus), सरकार और अदालत तक सीमित होकर रह जाए। गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में अरावली रेंज में रहने वालों का इस निर्णय में शामिल होना जरूरी है। अरावली बची तो उनकी रोजी-रोटी सुरक्षित रहेगी। चारों राज्यों में फैली अरावली रेंज के समाज और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का भी अध्ययन होना चाहिए। यह अध्ययन मरुस्थल बनने के खिलाफ हमारी ढाल, वॉटर रिचार्ज जोन, जलवायु नियामक, प्रदूषण सोखने वाले स्रोत और वन्यजीव आवास को खनन, रीयल एस्टेट अतिक्रमण, कचरा डंपिंग और उसे जलाने से हुए नुकसान का आकलन करने के लिए जरूरी है। इसमें आसपास बसे लोगों की सेहत और रोजी-रोटी को हुए नुकसान को भी शामिल करना चाहिए।

    क्या अरावली रेंज से लोगों को आजीविका मिल रही है?
    अरावली के आसपास बसे लोग आजीविका के लिए इस पर निर्भर हैं। वे इन छोटी पहाड़ियों पर मवेशी चराते हैं। दक्षिण हरियाणा और राजस्थान में अरावली के आसपास पानी की कमी से खेती घटी है। खनन से लोगों में त्वचा, लीवर और किडनी की समस्याएं बढ़ रही हैं। दमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मनरी डिजीज (COPD), TB जैसी बीमारियां हो रही हैं। अरावली पर मिलने वाली औषधियां कम हो गई। पहाड़ों पर ब्लास्ट की वजह से लोगों के मकान दरक रहे हैं।

    अरावली को अब तक कितना नुकसान हुआ ?
    पिछले कुछ दशकों में 692 किलोमीटर में फैली अरावली पर्वत रेंज में 12 बड़ी दरारें खुल गई। ये दरारें राजस्थान में अजमेर से झुंझुनू और दक्षिण हरियाणा में महेंद्रगढ़ तक फैली हैं। इनकी वजह से थार की धूल दिल्ली-NCR पहुंच रही है और यहां प्रदूषण बढ़ रहा है। नई परिभाषा से अरावली की और अधिक पहाड़ियां नष्ट होंगी।

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