रॉबर्ट कियोसाकी ने यह बात ऐसे समय की है जब सोना और चांदी की कीमतों में खूब उछाल आ रहा है। हालांकि बिटकॉइन की कीमत इस समय उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रही है और निवेशकों को बहुत अच्छा रिटर्न नहीं दिया है। बात अगर अमेरिकी डॉलर की करें तो इसमें हाल में कुछ गिरावट देखी गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ के बाद अमेरिकी डॉलर की कीमत में काफी बदलाव देखने को मिला है।
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‘कीमत मायने नहीं रखती’ वाली रणनीति
कियोसाकी में अपनी पोस्ट में कहा कि सोना, चांदी, बिटकॉइन और इथेरियम की छोटी अवधि की कीमतों में उतार-चढ़ाव उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। इसके पीछे उनके तीन मुख्य कारण हैं:
1. अमेरिका पर बढ़ता कर्ज
कियोसाकी लंबे समय से फिएट करेंसी (सरकारी मुद्रा) और सरकार द्वारा समर्थित मौद्रिक प्रणालियों के आलोचक रहे हैं। उन्होंने अपने तर्क को अमेरिका के बढ़ते राष्ट्रीय कर्ज और अमेरिकी डॉलर की घटती क्रय शक्ति से जोड़ा। अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 36 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर चला गया है और वित्तीय घाटा भी बहुत ज्यादा है। कियोसाकी कह चुके हैं कि सरकार के पास अपने कर्ज चुकाने के लिए पैसे छापने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा।
2. अमेरिकी डॉलर का गिरना
उन्होंने अपनी पोस्ट में कहा कि अमेरिकी डॉलर की कीमत में गिरावट आ गई है। उन्होंने तर्क दिया कि जब मुद्रा का अवमूल्यन (मूल्य का कम होना) का दीर्घकालिक रुझान स्पष्ट है, तो अल्पावधि (कम समय) के मूल्य उतार-चढ़ाव अप्रासंगिक हैं। उन्होंने इस समस्या को अमेरिकी फेडरल रिजर्व और ट्रेजरी जैसे संस्थानों को चलाने वाले उच्च शिक्षित नीति निर्माताओं के फैसलों से जोड़ा।
वे अमेरिकी डॉलर को ‘नकली पैसा’ मानते हैं, जिसकी खरीदने की शक्ति हर बार फेडरल रिजर्व द्वारा क्वांटिटेटिव ईजिंग (QE) करने पर कम हो जाती है। क्यूई का मतलब है कि सेंट्रल बैंक अर्थव्यवस्था में ज्यादा पैसा डालता है, जिससे पैसे की कीमत गिर जाती है।
3. ‘अयोग्य’ नेतृत्व
कियोसाकी ने अपनी पोस्ट में अमेरिकी नेतृत्व पर भी सवाल उठाए। उन्होंने लिखा है, ‘सोने, चांदी, बिटकॉइन और इथेरियम की कीमत की चिंता क्यों करें, जब दुनिया में अक्षम, उच्च शिक्षित पीएचडी वाले लोग हैं… जैसे मेरे पुअर डैड…. जो फेड, ट्रेजरी और अमेरिकी सरकार को नियंत्रित कर रहे हैं?’
कियोसाकी अक्सर मौजूदा फेडरल रिजर्व और ट्रेजरी अधिकारियों की तुलना अपने ‘पुअर डैड’ से करते हैं। उनके पुअर डैड बहुत पढ़े-लिखे थे, लेकिन कियोसाकी के अनुसार, उनमें इतनी समझदारी नहीं थी कि वे वैश्विक अर्थव्यवस्था को इस तरह चला सकें कि मुद्रा बर्बाद न हो।













