सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की ये टिप्पणी?
यह टिप्पणी चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और एन वी अंजारिया की बेंच ने झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन की ओर से दायर एक याचिका पर की। इस याचिका में झारखंड हाईकोर्ट के एक फैसले को चुनौती दी गई थी। इसमें न्यायिक अधिकारियों की भर्ती के लिए प्रारंभिक परीक्षा में शामिल होने वाले उम्मीदवारों की ओर से दिए गए एक प्रश्न के दो विकल्पों में से किसी एक को एक अंक देने और दो प्रश्नों को हटाने का निर्देश दिया गया था।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, ‘क्या एक संवैधानिक अदालत को सिर्फ इसलिए सुपर-एग्जामिनर की भूमिका निभानी चाहिए क्योंकि परीक्षा न्यायिक अधिकारियों की भर्ती के लिए थी और प्रश्न कानून से संबंधित था? अगर हाईकोर्ट के जज डोमेन एक्सपर्ट की भूमिका निभाते हैं तो यह बहुत खतरनाक होगा।’
उन्होंने आगे कहा, ‘कल किसी जज को बायोकेमिस्ट्री का ज्ञान हो सकता है। क्या उसे बायोकेमिस्ट्री के क्षेत्र में भर्ती से संबंधित परीक्षा प्रश्न पत्रों और उत्तर कुंजियों में हस्तक्षेप करना चाहिए? हाईकोर्ट के जजों को इन मुद्दों को डोमेन एक्सपर्ट पर छोड़ देना चाहिए।’
- बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट ने प्रशासनिक पक्ष पर JPSC के परामर्श से प्रश्न तैयार किए थे। यह कहा गया, ‘उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन/पुनर्विचार की शक्ति सभी परीक्षाओं के लिए समान होनी चाहिए, न कि केवल न्यायिक सेवा परीक्षाओं के लिए। हाईकोर्ट सुपर-एग्जामिनर नहीं हो सकते, और ऐसे मुद्दों को डोमेन एक्सपर्ट पर छोड़ देना चाहिए।’
- बेंच ने कहा, ‘अगर ऐसा है, तो यह आवश्यक है कि हाईकोर्ट, अपनी न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग करते हुए, इस मुद्दे को हाईकोर्ट के प्रशासनिक पक्ष को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने के लिए संदर्भित करे ताकि उत्तर पुस्तिकाओं और उत्तर कुंजियों की फिर से जांच की जा सके।’
- बेंच ने हाईकोर्ट से एक विशेषज्ञ समिति गठित करने के लिए कहा जिसमें विषय विशेषज्ञ शामिल होंगे, जिसमें कानून और अंग्रेजी के क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी शामिल होंगे, ताकि उत्तर कुंजियों और उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन किया जा सके।
- जब वकील ने विवाद के शीघ्र समाधान की मांग की, तो बेंच ने हाईकोर्ट से इसे दो सप्ताह के भीतर हल करने और JPSC को एक रिपोर्ट भेजने के लिए कहा। वकील ने कहा कि पिछले ढाई साल से झारखंड न्यायिक सेवा में कोई भर्ती नहीं हुई है। इस पर CJI ने कहा, ‘मुझे इस बात की ज्यादा चिंता है कि 2017 से हाईकोर्ट के जजों के रूप में वकीलों की कोई पदोन्नति नहीं हुई है।’













