भारतीय दर्शन में निरन्तर यह कहा गया है कि कर्म केवल क्रिया नहीं, भावना भी है। वही कर्म फलदायी होता है जिसमें सेवा और सद्भाव निहित हो। ब्रह्मांड का न्यायालय बहुत सूक्ष्म है, वहाँ शब्दों से अधिक भाव तौले जाते हैं। आप कितना जानते हैं, यह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन आप कितना समझते हैं और कितना महसूस करते हैं, यह उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
यदि जीवन को ध्यान से देखें, तो पाएंगे कि जिन लोगों का दिल उदार होता है, उनके लिए रास्ते अपने आप खुलते चले जाते हैं। सहायता समय पर मिल जाती है, अवसर स्वयं दस्तक देते हैं और संकट भी किसी न किसी रूप में समाधान लेकर आता है। यह संयोग नहीं, बल्कि उस ऊर्जा का परिणाम है जो उदार हृदय से निरंतर प्रवाहित होती रहती है।
ब्रह्मांड गणना नहीं करता कि आपने कितना अर्जित किया, वह देखता है कि आपने कितना बाँटा, इसलिए जीवन में सफल ही नहीं, सार्थक बनना है तो दिल को छोटा नहीं, उदार और संवेदनशील बनाना ही होगा, दिल की उदारता जीवन को सहज और सफल बनाती है। संत बताते हैं कि अगर आप सामर्थ्यवान हैं तो कंजूसी का त्याग करें, संकीर्ण सोच, ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार से मुक्त होने का यथासम्भव प्रयास करें, ऐसा आचरण करने से ब्रह्माण्ड की शक्तियां आपकी सहायक बनती हैं।














