तीन लाख से अधिक व्यवसायों ने 170 अरब डॉलर (करीब 15.42 लाख करोड़ रुपये) के टैरिफ की वापसी की मांग की है। जस्टिस ब्रेट कवानॉघ (Brett Kavanaugh) ने सुनवाई के दौरान लिखा था कि अरबों डॉलर की वापसी का अमेरिकी खजाने पर बड़ा असर पड़ेगा। उन्होंने आगे कहा, ‘कोर्ट आज इस बारे में कुछ नहीं कह रहा है कि सरकार उन अरबों डॉलर को, जो उसने आयातकों से वसूले हैं, कैसे वापस करेगी। लेकिन यह प्रक्रिया शायद ‘गड़बड़’ होगी, जैसा कि मौखिक दलील के दौरान स्वीकार किया गया था।’
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क्या है कोर्ट के आदेश का मतलब?
कोर्ट के इस आदेश का सीधा मतलब यह है कि भले ही सरकार के पास टैरिफ भुगतान का विस्तृत रिकॉर्ड हो, लेकिन व्यक्तिगत आयातकों को वापसी की उम्मीद के लिए शायद अपने अलग मुकदमे दायर करने होंगे।
ट्रेड अटॉर्नी टेड पॉस्नर ने सीएनएन को बताया कि यह मामला कभी भी वापसी के बारे में नहीं था। साथ ही यह सोचना भी मुश्किल था कि सुप्रीम कोर्ट वापसी की प्रक्रिया के बारीक विवरण में जाएगा।’ इससे पहले ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेस्सेंट ने रॉयटर्स को बताया था कि एजेंसी के पास आयातकों को वापस भुगतान करने के लिए पर्याप्त नकदी है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि इस प्रक्रिया में एक साल तक लग सकता है।
क्या करना होगा कंपनियों को?
सुप्रीम कोर्ट ने यह तो कह दिया कि टैरिफ गलत थे, लेकिन यह नहीं बताया कि पैसा वापस कैसे मिलेगा। जस्टिस कवानॉघ ने कहा कि अरबों डॉलर की वापसी से सरकार के खजाने पर असर पड़ेगा। उन्होंने यह भी माना कि यह वापसी की प्रक्रिया ‘गड़बड़’ हो सकती है। इसका मतलब है कि कंपनियों को शायद खुद ही कोर्ट में जाकर पैसे वापस मांगने पड़ेंगे। यह एक लंबी और मुश्किल प्रक्रिया हो सकती है। एक ट्रेड वकील ने कहा कि यह मामला वापसी के बारे में था ही नहीं और सुप्रीम कोर्ट इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता था।
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पहले भी वापस करनी पड़ी थी रकम?
यह पहली बार नहीं होगा जब अमेरिकी सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टैरिफ की वापसी करनी पड़ी हो। साल 1998 के एक फैसले के कारण अमेरिकी कंपनियों को 730 मिलियन डॉलर की वापसी मिली थी, हालांकि इस प्रक्रिया में दो साल लगे थे।
क्या भारतीय निर्यातकों को रिफंड मिलेगा?
टैरिफ हटने के बाद अब यह बात सामने आ रही है कि क्या भारतीय निर्यातकों को रिफंड वापस मिलेगा? कई एक्सपर्ट का मानना है कि उन्हें सीधे तौर पर रिफंड मिलने की संभावना बहुत कम है। इसकी वजह यह है कि टैरिफ का भुगतान भारतीय निर्यातकों ने नहीं बल्कि अमेरिकी आयातकों ने अमेरिकी सरकार को किया था।
दरअसल, जब कोई अमेरिकी कंपनी भारत से सामान मंगाती है तो वही कंपनी अमेरिकी कस्टम विभाग को टैरिफ चुकाती है। बाद में यह अतिरिक्त लागत अमेरिकी उपभोक्ताओं से वसूली जाती है। ऐसे में अगर रिफंड की कोई प्रक्रिया शुरू होती भी है, तो उसका लाभ भारतीय निर्यातकों को ना मिलकर अमेरिकी आयातकों को मिलेगा। अब अमेरिकी कोर्ट ने भले ही टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया गया हो, लेकिन उस अवधि में भारतीय निर्यातकों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए अमेरिका में कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है।













