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  • 12वीं की स्टेट टॉपर को 5 साल जेल, आखिर कैसे खुला नकल का फर्जीवाड़ा? 17 साल बाद आया फैसला

    बात साल 2008 की है। छत्तीसगढ़ बोर्ड का 12वीं का रिजल्ट आया और टॉपर का नाम था पोराबाई। बिर्रा के सरस्वती शिशु मंदिर हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ने वाली पोराबाई का नाम स्टेट टॉपर लिस्ट में सबसे ऊपर देखकर किसी को यकीन नहीं हुआ। नंबर आए 500 में से 484। गांव में रहने वाली एक


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    By Azad Hind Desk जनवरी 30, 2026
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    बात साल 2008 की है। छत्तीसगढ़ बोर्ड का 12वीं का रिजल्ट आया और टॉपर का नाम था पोराबाई। बिर्रा के सरस्वती शिशु मंदिर हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ने वाली पोराबाई का नाम स्टेट टॉपर लिस्ट में सबसे ऊपर देखकर किसी को यकीन नहीं हुआ। नंबर आए 500 में से 484। गांव में रहने वाली एक लड़की की इस सफलता से प्रशासन खुश था, लेकिन सवाल उठते देर नहीं लगी। आरोप लगे कि पेपर किसी और से लिखवाए गए हैं। अब करीब 17 साल के बाद इस मामले में फैसला आया है।

    सेकेंड एडिशनल सेशन जज गणेश सम पटेल ने टॉपर पोराबाई समेत 4 लोगों को दोषी माना है। इन चारों को 5-5 साल की सजा सुनाई गई है। दोषियों में पोराबाई के अलावा उस समय स्कूल का प्रिंसिपल, सेंटर का अध्यक्ष और टीचर शामिल है। यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि सबूतों के अभाव में निचली अदालत में ये बरी हो गए थे। लेकिन छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने फिर से अपील की। इस एक केस ने नकल के काले धंधे को भी उजागर किया, जिसके बाद कानून कड़े किए गए।

    पहले समझते हैं मामला क्या है

    2028 में 12वीं की बोर्ड परीक्षा में पोराबाई छत्तीसगढ़ की टॉपर घोषित हुई। उसने 500 में से 484 अंक हासिल किए। लेकिन उसके बैकग्राउंड को देखते हुए तुरंत ही इस रिजल्ट पर सवाल खड़े हो गए और माध्यमिक शिक्षा मंडल ने जांच के आदेश दे दिए। जांच रिपोर्ट में ऐसा बहुत कुछ मिला, जो इस बात की ओर इशारा करते थे कि यहां गड़बड़ी हुई है। प्रशासन ने भी सख्त कदम उठाते हुए 9 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया।

    आखिर कैसे खुली फर्जीवाड़े की पोल

    दरअसल हुआ क्या कि जब गांव में रहने वाली पोराबाई स्टेट टॉपर बनी तो उस समय माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन बीकेएस रे काफी प्रभावित हुए। टॉपर की सूची में एक गांव की बेटी का नाम सबसे ऊपर देखकर उन्होंने फैसला किया कि वह खुद उससे मिलकर उसे सम्मानित करेंगे। लेकिन इससे पहले उन्होंने अधिकारियों से टॉपर पोराबाई की कॉपी मंगवाई ताकि वे देख सकें कि इस बिटिया ने क्या कमाल किया है।

    बस यहीं पर सारा फर्जीवाड़ा खुल गया। पोराबाई की कॉपी बहुत ही अच्छी और साफसुथरी लिखी हुई थी। यही नहीं उसमें अंग्रेजी के ऐसे भारी-भरकम और हाईलेवल शब्दों का इस्तेमाल हुआ था, जिन्हें पढ़कर यह यकीन करना नामुमकिन था कि इसे गांव में रहने वाली एक लड़की ने लिखा है। बीकेएस रे ने तुरंत बोल दिया, यह सब फर्जी है।

    पुराने रिकॉर्ड ने साफ कर दी तस्वीर

    इसके बाद उसके पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए। पता चला कि वो कभी सेकंड या थर्ड डिविजन से आगे नहीं बढ़ी। यही नहीं कुछ मौकों पर तो फेल भी हुई है। यही नहीं जब मीडिया ने सवाल किया तो उसने खुद टॉपर आने पर हैरानी जताई। इसके अलावा शिक्षा मंडल के चेयरमैन को एक और चीज अखरी। अलग-अलग पेपर में अलग-अलग हैंडराइटिंग।

    पेपर देने ही नहीं पहुंची थी

    जांच हुई तो यह बात भी निकलकर आई कि जहां उसका एग्जाम सेंटर था, वहां वो परीक्षा देने पहुंची ही नहीं थी। मतलब साफ हो गया था कि उसके बदले किसी और ने पेपर दिए। शिक्षा मंडल चेयरमैन की शिकायत पर पोराबाई और बाकी आरोपियों को जेल भेजा गया। लेकिन 12 साल बाद संतोषजनक सबूत नहीं मिले तो उन्हें बरी कर दिया गया। लेकिन शिक्षा मंडल ने हार नहीं मानी और आखिरकार उनकी जीत हुई।

    क्यों जरूरी है यह फैसला

    छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के अन्य राज्यों में कई बार नकल या फर्जीवाड़ा कर अपात्र छात्र-छात्राएं वो मुकाम हासिल कर लेते हैं, जिनके वो लायक नहीं होते। जबकि योग्य छात्र पीछे छूट जाते हैं और कई बार दुखी होकर वे ऐसा कदम उठा लेते हैं, जो उन्हें नहीं उठाना चाहिए। यह फैसला ऐसे छात्रों में कानून व्यवस्था और शिक्षा प्रणाली में निष्पक्षता को लेकर भरोसा कायम करेगा।

    नकल करने पर क्या है सजा का प्रावधान

    नकल को लेकर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने सख्त नियम बनाए हैं। स्कूल परीक्षा में नकल या फर्जीवाड़ा करने पर छात्र को 3 साल तक की सजा हो सकती है। CBSE परीक्षा साथ ही जीवनभर के लिए उसे बैन किया जा सकता है। 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का भी प्रावधान है। इसी तरह प्रतियोगी परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा रोकने के लिए सार्वजनिक परीक्षा अनुचित साधन रोकथाम अधिनियम 2024 कानून है। इसके तहत 10 साल तक की सजा और 1 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है।

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